
Kerala Congress CJI Post: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को लेकर केरल कांग्रेस के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से की गई विवादित टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) के अध्यक्ष सहित पदाधिकारियों को नोटिस जारी कर पूछा है कि उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर न्यायपालिका की गरिमा और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली टिप्पणियों को स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि न्यायिक संयम को उसकी कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए।
‘अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ भी स्वीकार नहीं’
सुनवाई के दौरान जस्टिस अरविंद कुमार ने कहा कि अदालत खुद पर नियंत्रण रखती है, लेकिन इसे कमजोरी नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी को भी कुछ भी कहने की छूट नहीं दी जा सकती।
पीठ ने संविधान की सर्वोच्चता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता का उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत अपना दायित्व संवैधानिक दायरे में रहकर निभाती है। इसके लिए किसी राजनीतिक दल या संगठन की सहमति की जरूरत नहीं है। अदालत की गरिमा को प्रभावित करने वाले प्रयासों से सख्ती से निपटा जाएगा।
क्या था केरल कांग्रेस का विवादित पोस्ट?
यह विवाद 12 अक्टूबर को केरल कांग्रेस के आधिकारिक X अकाउंट से प्रकाशित एक पोस्ट के बाद शुरू हुआ था। इसमें CJI सूर्यकांत को संबोधित करते हुए उनसे इस्तीफा देने की मांग की गई थी। पोस्ट में यह भी कहा गया था कि उनके स्थान पर किसी दूसरे व्यक्ति को ढूंढ लिया जाएगा।
पोस्ट सामने आने के बाद कानूनी और राजनीतिक हलकों में इसकी आलोचना हुई। विवाद बढ़ने पर केरल कांग्रेस ने पोस्ट को हटा दिया और सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी।
पार्टी की ओर से बाद में कहा गया कि संबंधित पोस्ट प्रदेश नेतृत्व की जानकारी, सहमति या मंजूरी के बिना प्रकाशित किया गया था। पार्टी ने यह भी स्पष्ट किया कि पोस्ट में इस्तेमाल की गई भाषा उसके आधिकारिक रुख को नहीं दर्शाती।
वकील की शिकायत के बाद अदालत ने लिया संज्ञान
इस मामले में अधिवक्ता विनीत जिंदल ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर विवादित पोस्ट की जानकारी दी थी। उन्होंने अदालत से केरल कांग्रेस के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू करने पर विचार करने का अनुरोध किया था।
इस शिकायत के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सुनवाई के लिए लिया। अदालत ने अब केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पदाधिकारियों को नोटिस जारी कर उनका पक्ष मांगा है। उनसे जवाब देने को कहा गया है कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।
कांग्रेस ने मांगी बिना शर्त माफी
सुनवाई के दौरान केरल कांग्रेस की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि पार्टी इस मामले में बिना शर्त माफी मांगने को तैयार है। इसके लिए हलफनामा भी दाखिल करने की बात कही गई।
इस पर अदालत ने कहा कि वह माफी की वास्तविक मंशा की जांच करेगी। पीठ यह देखेगी कि माफी दिल से मांगी गई है या केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए दस्तावेज दाखिल किया जा रहा है। यानी अदालत के सामने केवल माफी मांगना ही नहीं, बल्कि उसकी गंभीरता और विश्वसनीयता भी महत्वपूर्ण होगी।
वरिष्ठ वकीलों को बनाया गया एमिकस क्यूरी
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में सहायता के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार और गौरव अग्रवाल को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया है। एमिकस क्यूरी का अर्थ ऐसे वकील से है, जो किसी मामले में अदालत को कानूनी पहलुओं पर निष्पक्ष सहायता देता है।
अदालत ने अटॉर्नी जनरल से भी मामले में सहयोग करने को कहा है। इससे सुनवाई के दौरान कानूनी और संवैधानिक पहलुओं पर अदालत को अतिरिक्त सहायता मिल सकेगी।
पदाधिकारियों को व्यक्तिगत पेशी से मिली छूट
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल केरल कांग्रेस के पदाधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने से छूट दे दी है। हालांकि, उन्हें नोटिस का जवाब देना होगा और माफी से संबंधित हलफनामा दाखिल करना पड़ सकता है।
मामले की अगली सुनवाई दिसंबर में होगी। उस दौरान अदालत पार्टी के जवाब, माफी और अन्य कानूनी पहलुओं पर विचार करेगी। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना के आरोपों पर अंतिम फैसला नहीं दिया है।
माफी और जवाब के बाद तय होगी आगे की कार्रवाई
केरल कांग्रेस की ओर से विवादित पोस्ट हटाने और माफी मांगने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया है। अदालत अब यह जांचेगी कि पोस्ट किन परिस्थितियों में प्रकाशित हुआ, पार्टी की जिम्मेदारी क्या बनती है और दी गई माफी कितनी वास्तविक है।
दिसंबर में होने वाली अगली सुनवाई में केरल कांग्रेस के जवाब और अदालत के सामने रखे गए कानूनी पक्षों पर आगे विचार किया जाएगा। इस मामले में अंतिम निर्णय अदालत की सुनवाई और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर होगा।
written by Siddhi Srivastava



