
PM Narendra Modi: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम को संबोधित करते हुए भारत के लोकतंत्र, डिजिटल विकास और वैश्विक अर्थव्यवस्था में देश की भूमिका पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि भारत लोकतंत्र की जननी है और यहां अलग-अलग मुद्दों पर खुलकर बहस होती है। प्रधानमंत्री ने तकनीक, डेटा, ज्ञान और नवाचार को 21वीं सदी में शक्ति के प्रमुख स्रोत बताते हुए कहा कि असली सवाल यह नहीं है कि ताकत किसके पास है, बल्कि यह है कि उसका इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है।
प्रधानमंत्री के संबोधन में वैश्विक चुनौतियों, सप्लाई चेन, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी बदलाव और देशों के बीच भरोसे की जरूरत जैसे मुद्दे भी शामिल रहे। उन्होंने कहा कि दुनिया में शक्ति के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच भारत एक अलग सोच के साथ आगे बढ़ रहा है।
‘भारत लोकतंत्र की जननी है’, डिजिटल ताकत का किया जिक्र
ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में पीएम मोदी ने भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और विविधता का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत में 100 से अधिक भाषाएं हैं। देश में हजारों पंजीकृत समाचार पत्र और प्रकाशन तथा एक हजार से अधिक सैटेलाइट टीवी चैनल हैं। प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया के व्यापक इस्तेमाल का जिक्र करते हुए डिजिटल प्लेटफॉर्म को लोगों तक जानकारी पहुंचाने और सार्वजनिक चर्चा को बढ़ावा देने वाला माध्यम बताया।
पीएम मोदी के मुताबिक, भारत में अलग-अलग मुद्दों पर खुलकर बहस होती है और जनता अपनी राय रखती है। उन्होंने डिजिटल तकनीक की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि पिछले एक दशक में देश में मोबाइल और इंटरनेट की पहुंच बढ़ने से लोगों के लिए नए अवसर बने हैं।
प्रधानमंत्री ने डिजिटल कनेक्टिविटी को केवल तकनीकी सुविधा के तौर पर नहीं, बल्कि लोगों की क्षमता और भागीदारी बढ़ाने वाले माध्यम के रूप में पेश किया। उनके संबोधन में यह बात प्रमुखता से रही कि तकनीक का लाभ समाज के बड़े हिस्से तक पहुंचना चाहिए।
‘दुनिया में पावर की भागदौड़ के बीच भारत की सोच अलग’
वैश्विक परिस्थितियों का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि 21वीं सदी का मौजूदा दशक कई बड़ी चुनौतियां लेकर आया है। दुनिया ने कोरोना महामारी का दौर देखा है और विभिन्न क्षेत्रों में युद्धों के कारण भी अनिश्चितता बढ़ी है। इसके अलावा व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और महत्वपूर्ण खनिजों से जुड़ी चुनौतियां भी सामने आई हैं।
पीएम मोदी ने कहा कि कई बार दुनिया एक संकट से निकलने का रास्ता तलाश रही होती है, तभी एक नई चुनौती सामने आ जाती है। उन्होंने सप्लाई चेन, ऊर्जा, खनिज, भुगतान व्यवस्था और तकनीक का उल्लेख करते हुए कहा कि जिन व्यवस्थाओं ने पहले दुनिया को जोड़ने में भूमिका निभाई, उनका इस्तेमाल अब दबाव बनाने के माध्यम के रूप में भी किया जा रहा है।
प्रधानमंत्री के अनुसार, ऐसी परिस्थितियों में देशों के बीच भरोसा बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। भरोसा इस बात का कि जरूरत के समय जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति जारी रहेगी और साझेदार देश अपने वादों पर कायम रहेंगे। उन्होंने भारत को इसी संदर्भ में एक अलग सोच रखने वाले देश के रूप में प्रस्तुत किया।
तकनीक, डेटा और ज्ञान को बताया 21वीं सदी की ताकत
अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हर दौर में शक्ति के स्रोत और उसकी परिभाषा बदलती रही है। लेकिन 21वीं सदी में तकनीक, डेटा, ज्ञान और नवाचार की भूमिका तेजी से बढ़ी है। उन्होंने कहा कि अब महत्वपूर्ण सवाल केवल यह नहीं है कि शक्ति किसके पास है, बल्कि यह भी है कि उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है।
पीएम मोदी ने सवाल उठाया कि क्या तकनीक का लाभ केवल कुछ लोगों तक सीमित रहेगा या इससे करोड़ों लोगों के लिए नए अवसर पैदा होंगे। इसी तरह, क्या ज्ञान कुछ लोगों की ताकत बना रहेगा या वह व्यापक समाज की क्षमता बढ़ाने में मदद करेगा?
प्रधानमंत्री ने इस विचार को ‘पावर टू एम्पावर’ यानी शक्ति के जरिए दूसरों को सशक्त बनाने की सोच से जोड़ा। उनके संबोधन का मुख्य संदेश यह रहा कि तकनीकी प्रगति का उद्देश्य केवल आर्थिक या संस्थागत ताकत बढ़ाना नहीं, बल्कि लोगों के लिए अवसरों का विस्तार करना भी होना चाहिए।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और वैश्विक भरोसे की चुनौती
प्रधानमंत्री ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उल्लेख करते हुए कहा कि यह विभिन्न क्षेत्रों में काम करने के तरीकों को बदल रही है। इसके साथ ही कई देशों में बढ़ती उम्र वाली आबादी से जुड़ी चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। ऐसे बदलते वैश्विक परिदृश्य में उन्होंने भरोसे को सबसे अहम सवालों में से एक बताया।
उनके मुताबिक, देशों और साझेदारों के बीच भरोसा होना चाहिए कि संकट के समय आपूर्ति बाधित नहीं होगी और किए गए वादे निभाए जाएंगे। वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थिरता बनाए रखने के लिए यह भरोसा जरूरी है।
ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम के मंच से पीएम मोदी ने भारत की लोकतांत्रिक विविधता, डिजिटल विकास और तकनीकी बदलावों पर जोर दिया। उन्होंने वैश्विक शक्ति की बदलती परिभाषा के बीच इस बात को प्रमुखता दी कि तकनीक और ज्ञान का इस्तेमाल अधिक लोगों को सशक्त बनाने के लिए किया जाना चाहिए।



