
नई दिल्ली। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत और रूस के दशकों पुराने रिश्तों का जिक्र करते हुए कहा कि दोनों देशों के संबंध लंबे समय के भरोसे और साझा अनुभवों पर आधारित हैं। जर्मनी में एक कार्यक्रम के दौरान जयशंकर ने कहा कि हर देश दूसरे देशों के साथ अपने रिश्ते अपने अनुभवों के आधार पर तय करता है। भारत का रूस को लेकर अनुभव ऐतिहासिक रूप से सकारात्मक रहा है।
जयशंकर ने कहा कि यूरोप रूस के साथ भारत के संबंधों को अपने नजरिए से नहीं देख सकता। इसी तरह भारत भी रूस के साथ अपने रिश्तों को यूरोपीय देशों के दृष्टिकोण से तय नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि देशों के बीच रिश्तों को समझने के लिए उनके ऐतिहासिक अनुभवों को ध्यान में रखना जरूरी है।
संकट के दौर में सोवियत संघ ने भारत का साथ दिया
विदेश मंत्री ने 20वीं सदी में भारत को मिले सोवियत समर्थन का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 1950 के दशक में जब पश्चिमी देशों के पाकिस्तान के सैन्य शासन के साथ संबंध थे, उस दौर में सोवियत संघ ने भारत का समर्थन किया।
जयशंकर ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उस समय अमेरिका की ओर से भारत पर दबाव बढ़ाया गया था और अमेरिकी युद्धपोत क्षेत्र में भेजे गए थे। ऐसे समय में सोवियत संघ ने भारत के समर्थन में अपनी नौसैनिक ताकत को आगे किया था।
1970-80 के दशक में और मजबूत हुए रिश्ते
जयशंकर के मुताबिक भारत और रूस के संबंध समय के साथ और गहरे होते गए। खासकर 1970 और 1980 के दशक में दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी मजबूत हुई। इसमें रक्षा, परमाणु सहयोग और व्यापार जैसे क्षेत्र शामिल रहे।
उन्होंने कहा कि बदलते वैश्विक हालात के साथ भारत-रूस संबंधों का स्वरूप भी बदला है। रक्षा और परमाणु सहयोग अब भी रिश्तों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध भी तेजी से महत्वपूर्ण हुए हैं।
रूस से तेल खरीद पर पश्चिम के सवालों का भारत देता रहा जवाब
रूस आज भी भारत के लिए कच्चे तेल का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से तेल खरीदने को लेकर अमेरिका और यूरोपीय देशों ने भारत पर कई बार सवाल उठाए हैं।
भारत ने लगातार अपने ऊर्जा हितों का बचाव किया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी कई मौकों पर कह चुके हैं कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर फैसले करता है। रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर भारत ने पश्चिमी देशों के रुख पर सवाल उठाते हुए उनके दोहरे मानदंडों की ओर भी इशारा किया है।
जयशंकर की ताजा टिप्पणी को भारत-रूस संबंधों के ऐतिहासिक आधार और बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच नई दिल्ली की स्वतंत्र विदेश नीति के संदर्भ में देखा जा रहा है।



