Sugar Price hike: चीनी के दाम में अचानक उछाल, 56 रुपये किलो के करीब पहुंची कीमत; जानिए क्यों महंगी हो रही चीनी

Sugar Price hike: देश में चीनी की कीमतों में पिछले कुछ हफ्तों में तेजी देखने को मिली है। इसका असर सीधे आम लोगों की रसोई पर पड़ रहा है। वहीं, गन्ना किसान भी बढ़ती कीमतों के बीच अपने हिस्से के मुनाफे को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 20 जुलाई 2026 को चीनी की औसत खुदरा कीमत करीब 48.18 रुपये प्रति किलो थी। 20 अगस्त तक यह बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलो हो गई। कुछ इलाकों में खुदरा कीमत 70 से 80 रुपये किलो तक पहुंचने की बात भी सामने आई है।

एक महीने में क्यों बढ़ गए चीनी के दाम?

चीनी की कीमत बढ़ने के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। सबसे बड़ा कारण घरेलू उत्पादन में कमी माना जा रहा है। इस साल भारत में चीनी का उत्पादन सामान्य वर्षों की तुलना में कम रहने का अनुमान है।

इसके अलावा त्योहारी सीजन में चीनी की मांग बढ़ने लगी है। मिठाई, बेकरी और दूसरे खाद्य उत्पादों में चीनी की खपत बढ़ने से बाजार पर दबाव बढ़ सकता है।

वैश्विक बाजार की स्थिति भी घरेलू कीमतों को प्रभावित कर रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी चीनी के दाम में तेजी दर्ज की गई है।

चीनी की कीमतों पर किसान नेता ने उठाए सवाल

चीनी के बढ़ते दामों के बीच किसान नेता राजू शेट्टी ने जमाखोरी और मुनाफाखोरी का मुद्दा उठाया है। उनका आरोप है कि कीमत बढ़ने का फायदा किसानों तक नहीं पहुंच रहा है।

शेट्टी का सवाल है कि अगर किसानों को गन्ने और चीनी की बढ़ी कीमत का पूरा लाभ नहीं मिल रहा, तो बाजार में चीनी इतनी तेजी से महंगी क्यों हो रही है।

उनका दावा है कि कुछ बड़े उत्पादकों और कारोबारियों ने कम कीमत पर चीनी खरीदकर उसका स्टॉक किया और बाद में ऊंचे दाम पर बेचकर मुनाफा कमाया।

महाराष्ट्र में उत्पादन घटने का असर

महाराष्ट्र देश के प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों में शामिल है। महाराष्ट्र के चीनी आयुक्त संजय कोल्टे के मुताबिक, प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण इस साल चीनी उत्पादन पिछले साल की तुलना में कम हुआ है।

इसके साथ ही गन्ने का एक हिस्सा इथेनॉल उत्पादन की ओर भी गया है। इससे चीनी के लिए उपलब्ध गन्ने की मात्रा पर असर पड़ने की बात कही जा रही है।

हालांकि, केंद्र सरकार चीनी की कीमतों में तेजी के लिए इथेनॉल उत्पादन को मुख्य वजह मानने से सहमत नहीं है।

सरकार का कहना है, इथेनॉल वजह नहीं

केंद्र सरकार के अनुसार इथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाली चीनी की मात्रा में कमी आई है। सरकार का यह भी कहना है कि अब इथेनॉल उत्पादन में अनाज का इस्तेमाल पहले की तुलना में ज्यादा हो रहा है।

इसलिए सरकार के मुताबिक चीनी की मौजूदा कीमतों के लिए केवल इथेनॉल नीति को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

इस साल कितना चीनी उत्पादन होने का अनुमान?

सरकार ने देश में चीनी उत्पादन का अनुमान घटाकर करीब 306 लाख टन कर दिया है। सामान्य तौर पर भारत में करीब 320 से 340 लाख टन तक चीनी का उत्पादन होता है।

उत्पादन में कमी का असर बाजार की उपलब्धता पर पड़ सकता है। इसके साथ ही गन्ना किसानों को भुगतान को लेकर भी चिंता बनी हुई है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी बढ़ी कीमत

चीनी के दाम केवल भारत में ही नहीं बढ़े हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कीमतों में तेजी देखी गई है।

बताए गए आंकड़ों के अनुसार, 30 जून को अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमत करीब 474 डॉलर प्रति टन थी। 20 अगस्त तक यह बढ़कर करीब 552 डॉलर प्रति टन हो गई।

इसका मतलब है कि घरेलू बाजार के साथ वैश्विक बाजार का दबाव भी चीनी की कीमतों पर पड़ रहा है।

महाराष्ट्र में किसानों का प्रदर्शन

बढ़ती कीमतों के बीच महाराष्ट्र में गन्ना किसानों ने भी प्रदर्शन किया है। किसानों की मांग है कि चीनी के बाजार भाव बढ़ने का फायदा उन्हें भी मिलना चाहिए।

प्रदर्शन कर रहे किसानों ने उचित भुगतान के साथ बिजली बिलों में राहत और अन्य मांगें भी उठाई हैं। किसानों का कहना है कि बाजार में चीनी महंगी होने के बावजूद उन्हें उनकी उपज का पर्याप्त लाभ नहीं मिल रहा है।

जमाखोरी रोकने के लिए सरकार की सख्ती

बाजार में कृत्रिम कमी और जमाखोरी रोकने के लिए सरकार ने चीनी के स्टॉक पर निगरानी बढ़ाई है। इसके तहत 400 टन की स्टॉक सीमा लागू की गई है।

बड़े खरीदारों को भी जरूरत से ज्यादा चीनी रखने पर प्रतिबंध लगाया गया है। उन्हें 15 दिनों की जरूरत से अधिक स्टॉक रखने की अनुमति नहीं है।

इसके अलावा, कीमतों पर दबाव कम करने के लिए सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क मुक्त आयात की अनुमति भी दी है।

आगे क्या होगा?

चीनी की कीमतों में मौजूदा तेजी के पीछे सिर्फ एक कारण नहीं है। घरेलू उत्पादन में कमी, त्योहारी मांग, अंतरराष्ट्रीय बाजार और संभावित जमाखोरी जैसे कई कारक एक साथ काम कर रहे हैं।

सरकार की ओर से स्टॉक सीमा और आयात जैसे कदम उठाए गए हैं। अब यह देखना होगा कि इन उपायों का बाजार पर कितना असर पड़ता है।

आम उपभोक्ता के लिए सबसे बड़ी चिंता चीनी की बढ़ती कीमत है। वहीं गन्ना किसानों के सामने अलग सवाल है कि बाजार में बढ़े दाम का उचित हिस्सा उन्हें कब और कितना मिलेगा।

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