
Decoy Flight : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तुर्की यात्रा से लौटते समय कथित तौर पर विमान बदलने की गुप्त कार्रवाई ने 26 साल पुराने बिल क्लिंटन के पाकिस्तान दौरे की यादें ताजा कर दी हैं। दोनों मामलों में राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए विमान की पहचान छिपाने और संभावित हमलावरों को भ्रमित करने की रणनीति अपनाई गई।
2000 में क्लिंटन के लिए चला था ‘डिकॉय प्लेन’
मार्च 2000 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भारत दौरे के बाद पाकिस्तान पहुंचे थे। 25 मार्च को भारत से पाकिस्तान जाते समय उनकी सुरक्षा के लिए दो C-20 गल्फस्ट्रीम विमानों का इस्तेमाल किया गया।
रिपोर्टों के मुताबिक, क्लिंटन मुंबई से एक बिना पहचान वाले विमान में सवार हुए। वहीं अमेरिकी निशान और झंडे वाला दूसरा विमान पहले इस्लामाबाद पहुंचा। उस विमान से उतरने वाले सीक्रेट सर्विस के एक अधिकारी को क्लिंटन जैसा दिखने वाला बताया गया, ताकि यह भ्रम बना रहे कि राष्ट्रपति उसी विमान में हैं।
कुछ मिनट बाद क्लिंटन एक छोटे, बिना किसी पहचान चिह्न वाले ग्रे एग्जीक्यूटिव जेट से इस्लामाबाद पहुंचे। इस पूरी कवायद का मकसद संभावित हमलावरों के लिए राष्ट्रपति के विमान की पहचान करना मुश्किल बनाना था।
क्लिंटन की जान को था अल-कायदा का खतरा?
उस समय पाकिस्तान को अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए बेहद संवेदनशील और हाई-रिस्क डेस्टिनेशन माना जाता था। अमेरिकी अधिकारियों को हमले की आशंका थी, हालांकि व्हाइट हाउस ने उस समय किसी एक खास खतरे को इस सुरक्षा व्यवस्था की वजह के तौर पर सार्वजनिक नहीं किया था।
इतिहासकार टेलर ब्रांच ने बाद में अपनी किताब The Clinton Tapes: Wrestling History with the President में दावा किया कि खुफिया जानकारी में इस्लामाबाद में अल-कायदा के निशानेबाजों की मौजूदगी और क्लिंटन की हत्या की साजिश की आशंका सामने आई थी।
हालांकि, अल-कायदा के हमलावरों से जुड़ा यह विवरण बाद की किताब में सामने आया था और उस समय व्हाइट हाउस की ओर से इसकी सार्वजनिक पुष्टि नहीं की गई थी।
पत्रकारों को भी दी गई थी गुप्त जानकारी
क्लिंटन के पाकिस्तान दौरे से पहले कुछ पत्रकारों को राष्ट्रपति की सुरक्षा व्यवस्था के बारे में गोपनीय ब्रीफिंग दी गई थी। उस समय व्हाइट हाउस की रिपोर्टर और व्हाइट हाउस कॉरेस्पॉन्डेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष रही सुसान पेज ने बताया कि उन्हें डिकॉय विमान के इस्तेमाल सहित असाधारण सुरक्षा उपायों की जानकारी दी गई थी।
उन्होंने कहा कि उस समय ऑफ-द-रिकॉर्ड नियमों के कारण उन्होंने इस जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया। हालांकि, दो दशक से अधिक समय बीतने के बाद और पाकिस्तान में क्लिंटन के विमान से उतरने के बाद पूरी कवायद सामने आने के चलते उन्होंने अब इस घटना का जिक्र किया।
ट्रंप की सीक्रेट फ्लाइट में क्या हुआ?
ट्रंप की हालिया सुरक्षा कवायद भी इसी तरह संभावित खतरे से राष्ट्रपति की असली लोकेशन और विमान की पहचान छिपाने पर आधारित बताई गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप को पहले अंकारा में पुराने एयर फोर्स वन पर सवार होते हुए सार्वजनिक रूप से देखा गया। इसके बाद उन्हें कथित तौर पर एक छोटे C-32A सैन्य विमान में गुप्त तरीके से शिफ्ट किया गया। बताया गया कि दोनों विमानों के बीच ट्रंप को एयरपोर्ट के एक कैटरिंग ट्रक के जरिए ले जाया गया।
इसके बाद बड़ा विमान ब्रिटेन की ओर रवाना हुआ, जिससे पत्रकारों और व्हाइट हाउस के कुछ कर्मचारियों को भी यही लगा कि ट्रंप उसी विमान में हैं। रिपोर्टों के अनुसार, इस ऑपरेशन के पीछे ईरान से जुड़ा एक विश्वसनीय खतरा बताया गया।
ट्रंप ने खुद भी सुरक्षा खतरे का दिया संकेत
बाद में ट्रंप ने इस असामान्य सुरक्षा व्यवस्था पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके साथ यात्रा कर रहे पत्रकार संभवतः एक खतरनाक उड़ान में थे। उन्होंने संकेत दिया कि राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिहाज से ऐसे कदम जरूरी हो सकते हैं।
व्हाइट हाउस के संचार निदेशक स्टीवन चेउंग ने भी सुरक्षा उपायों का बचाव किया। उनका कहना था कि अमेरिका के कई दुश्मनों की नजर राष्ट्रपति पर है और ऐसे खतरों से निपटने के लिए उपलब्ध हर साधन का इस्तेमाल किया जाता है।
2000 और 2026 की सुरक्षा रणनीति में समानता
क्लिंटन और ट्रंप के मामलों में समय, परिस्थितियां और खतरे अलग हैं, लेकिन सुरक्षा रणनीति का मूल विचार समान दिखाई देता है – राष्ट्रपति के वास्तविक विमान और लोकेशन को संभावित हमलावरों से छिपाना।
2000 में क्लिंटन के लिए डिकॉय विमान का इस्तेमाल किया गया था, जबकि ट्रंप के मामले में कथित तौर पर विमान बदलने और एयरपोर्ट पर गुप्त ट्रांसफर की रणनीति अपनाई गई। दोनों घटनाएं बताती हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति की विदेश यात्राओं में सुरक्षा एजेंसियां संभावित खतरे की स्थिति में कितने असाधारण और गोपनीय उपाय कर सकती हैं।



