Adarsh Bal Vidyalaya Review: हंसाते-हंसाते शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाती है केके मेनन की यह वेब सीरीज

सरकारी स्कूलों की चुनौतियों, शिक्षकों की मजबूरियों और परीक्षा प्रणाली पर व्यंग्य करती है हिमांक गौर की सात एपिसोड वाली सीरीज।

Adarsh Bal Vidyalaya Review: देश में शिक्षा व्यवस्था, सरकारी स्कूलों की हालत और परीक्षा प्रणाली को लेकर लगातार बहस होती रही है। ऐसे माहौल में निर्देशक हिमांक गौर की वेब सीरीज ‘आदर्श बाल विद्यालय’ एक अलग अंदाज में इन गंभीर मुद्दों को दर्शकों के सामने रखती है। सात एपिसोड की यह सीरीज मनोरंजन के साथ-साथ सरकारी स्कूलों की चुनौतियों, शिक्षकों की मजबूरियों और छात्रों की वास्तविक समस्याओं पर भी रोशनी डालती है। करीब 40 मिनट के प्रत्येक एपिसोड वाली यह सीरीज हास्य और भावनात्मक पलों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश करती है।

कहानी: बदहाल स्कूल से बदलाव की शुरुआत

कहानी दिल्ली के एक सरकारी स्कूल ‘आदर्श बाल विद्यालय’ की है, जिसकी वास्तविक स्थिति उसके नाम से बिल्कुल उलट दिखाई गई है। जर्जर इमारत, सीमित संसाधन, अनुशासनहीन छात्र और व्यवस्था की अनदेखी स्कूल की बदहाली को साफ तौर पर दिखाते हैं।

स्कूल के प्रिंसिपल ज्ञानेश्वर त्रिपाठी (केके मेनन) एक बेफिक्र लेकिन संवेदनशील शिक्षक हैं, जो पढ़ाई से ज्यादा बच्चों के साथ समय बिताने में विश्वास रखते हैं। कहानी में मोड़ तब आता है, जब शिक्षा विभाग घोषणा करता है कि यदि स्कूल 10वीं बोर्ड परीक्षा में दिल्ली के शीर्ष-10 सरकारी स्कूलों में जगह बना लेता है, तो प्रिंसिपल और उनकी पत्नी को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में प्रशिक्षण का अवसर मिलेगा।

यहीं से शुरू होता है बदलाव का सफर। ज्ञानेश्वर अपने स्कूल, शिक्षकों और छात्रों को नई दिशा देने का फैसला करते हैं। लेकिन इस राह में उन्हें राजनीतिक दखल, संसाधनों की कमी, प्रशासनिक लापरवाही और शिक्षा व्यवस्था की कई खामियों का सामना करना पड़ता है।

निर्देशन: हास्य के जरिए गंभीर संदेश

निर्देशक हिमांक गौर ने शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं को भाषणबाजी से दूर रखते हुए व्यंग्य और हल्के-फुल्के हास्य के माध्यम से प्रस्तुत किया है। मिड-डे मील, सरकारी स्कूलों की बदहाल व्यवस्था, बच्चों पर राजनीतिक प्रभाव, शिक्षकों की परेशानियां और परीक्षा प्रणाली की विसंगतियां कहानी में स्वाभाविक रूप से सामने आती हैं।

हालांकि चौथे एपिसोड के बाद कहानी की रफ्तार थोड़ी धीमी महसूस होती है और कुछ कॉमिक दृश्य अपेक्षा से अधिक लंबे लगते हैं। इसके बावजूद सीरीज अपने मूल उद्देश्य और संदेश से भटकती नहीं है।

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अभिनय: केके मेनन पूरी तरह छाए

सीरीज की सबसे बड़ी ताकत इसकी शानदार स्टारकास्ट है।

केके मेनन ने प्रिंसिपल ज्ञानेश्वर त्रिपाठी के किरदार में बेहतरीन अभिनय किया है। गंभीर भूमिकाओं के लिए पहचाने जाने वाले मेनन यहां अपनी कॉमिक टाइमिंग और भावनात्मक अभिनय दोनों से प्रभावित करते हैं।

अर्चना पूरन सिंह राजनीतिक महत्वाकांक्षा से भरी उर्मिला के किरदार में प्रभाव छोड़ती हैं, जबकि देवेन भोजानी स्थानीय विधायक गोल्डी के रूप में कहानी में मनोरंजन का तड़का लगाते हैं। नवीन कस्तूरिया स्टूडेंट काउंसलर की भूमिका में सहज नजर आते हैं। प्रसन्ना बिष्ट, अभिमन्यु सिंह, अन्नपूर्णा सोनी, अजीतेश गुप्ता और बाल कलाकारों ने भी अपने-अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।

क्या देखें या नहीं?

अगर आप ऐसी वेब सीरीज पसंद करते हैं जो सिर्फ मनोरंजन ही नहीं बल्कि समाज के अहम मुद्दों पर सोचने के लिए भी मजबूर करे, तो ‘आदर्श बाल विद्यालय’ आपके लिए अच्छी पसंद हो सकती है। यह सीरीज सरकारी स्कूलों की चुनौतियों, शिक्षा व्यवस्था की खामियों और बदलाव की उम्मीद को संवेदनशीलता तथा हास्य के साथ प्रस्तुत करती है।

भले ही कुछ एपिसोड में कहानी की गति धीमी पड़ती हो, लेकिन मजबूत अभिनय, प्रभावशाली संवाद और सामाजिक संदेश इसे अंत तक रोचक बनाए रखते हैं।

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