
IRDAI New Rules: बीमा क्षेत्र की कंपनियों के लिए भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) ने नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके तहत कंपनियों के शेयर ट्रांसफर की मंजूरी के लिए लगने वाली प्रोसेसिंग फीस में बड़ी कटौती की गई है। पहले इस प्रक्रिया के लिए 50 लाख रुपये तक शुल्क देना पड़ता था, जिसे अब घटाकर 10 लाख रुपये कर दिया गया है। यानी कंपनियों को पहले के मुकाबले 40 लाख रुपये कम देने होंगे।
IRDAI ने 2 नवंबर 2026 को जारी मास्टर सर्कुलर में शेयर ट्रांसफर के अलावा बीमा कंपनियों के IPO और कर्मचारियों को शेयर देने की प्रक्रिया से जुड़े नियम भी स्पष्ट किए हैं। इन बदलावों का असर बीमा कंपनियों के शेयरहोल्डिंग ढांचे और नियामकीय मंजूरी की प्रक्रिया पर पड़ सकता है।
शेयर ट्रांसफर की मंजूरी फीस में 80% की कटौती
IRDAI के नए प्रावधान के मुताबिक, बीमा कंपनियों के शेयर ट्रांसफर की मंजूरी के लिए अब 10 लाख रुपये प्रोसेसिंग फीस देनी होगी। पहले यह रकम 50 लाख रुपये थी। इस तरह शुल्क में सीधे 80 प्रतिशत की कमी की गई है।
हालांकि, जिन कंपनियों ने नए नियम लागू होने से पहले पुरानी दर के अनुसार फीस जमा कर दी है, उन्हें अतिरिक्त भुगतान की रकम वापस नहीं मिलेगी। वहीं, कुछ पुराने नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) आवेदनों को फीस से छूट देने का प्रावधान भी किया गया है।
IPO लाने से पहले कंपनियों को देनी होगी पूरी जानकारी
IRDAI ने उन बीमा कंपनियों के लिए भी शर्तें तय की हैं, जो शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की तैयारी कर रही हैं। ऐसी कंपनियों को IPO से पहले और लिस्टिंग के बाद की प्रस्तावित शेयरहोल्डिंग का पूरा ब्योरा नियामक को देना होगा।
इसके अलावा, जिन शेयरधारकों के पास कंपनी की पेड-अप इक्विटी का 1 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है, उनकी जानकारी भी अलग से उपलब्ध करानी होगी। कंपनी को IPO लाने का उद्देश्य और उसके कुल आकार के बारे में भी बताना होगा।
IPO के तहत नए शेयर जारी करने और मौजूदा शेयरधारकों की ओर से हिस्सेदारी बेचने यानी ऑफर फॉर सेल (OFS) का विवरण अलग-अलग देना होगा। इससे यह स्पष्ट होगा कि IPO के जरिए कंपनी कितनी नई पूंजी जुटाना चाहती है और मौजूदा निवेशक कितने शेयर बेचने की योजना बना रहे हैं।
ESOP के जरिए कर्मचारियों को शेयर देने पर क्या नियम?
बीमा कंपनियां अपने कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने के लिए कर्मचारी स्टॉक विकल्प योजना यानी ESOP के तहत शेयर खरीदने का अवसर देती हैं। IRDAI ने इस प्रक्रिया से जुड़े मामलों में भी नियामकीय मंजूरी की जरूरत स्पष्ट की है।
नए दिशा-निर्देशों के मुताबिक, यदि कर्मचारियों के लिए बनाए गए ट्रस्ट के माध्यम से शेयर जारी किए जाते हैं या कंपनी के निदेशक निर्धारित परिस्थितियों में अतिरिक्त शेयर हासिल करते हैं, तो पहले IRDAI की मंजूरी लेना जरूरी होगा।
इस व्यवस्था का उद्देश्य शेयर आवंटन की प्रक्रिया पर नियामकीय निगरानी बनाए रखना और कंपनी के स्वामित्व ढांचे में होने वाले बदलावों की जानकारी सुनिश्चित करना है।
मर्जर से जुड़े नियमों पर भी नई गाइडलाइन
IRDAI के मास्टर सर्कुलर में बीमा कंपनियों के मर्जर यानी विलय से जुड़े प्रावधानों को भी शामिल किया गया है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में विलय की मंजूरी, उसकी प्रक्रिया और संबंधित शुल्क की विस्तृत शर्तें स्पष्ट नहीं हैं। इनके बारे में जानकारी के लिए नियामक की ओर से जारी मूल सर्कुलर देखना जरूरी होगा।
बीमा कंपनियों पर क्या पड़ेगा नए नियमों का असर?
शेयर ट्रांसफर की फीस घटने से बीमा कंपनियों को मंजूरी प्रक्रिया में होने वाला खर्च कम करने में मदद मिल सकती है। दूसरी ओर, IPO और ESOP से संबंधित जानकारी देने की शर्तों से शेयरहोल्डिंग में बदलाव पर नियामक की निगरानी मजबूत होगी।
कंपनियों को अब शेयर ट्रांसफर, IPO की तैयारी और कर्मचारियों को शेयर आवंटित करने से पहले नए दिशा-निर्देशों का पालन करना होगा। इन बदलावों से बीमा क्षेत्र में कारोबार और निवेश से जुड़ी प्रक्रियाओं पर क्या असर पड़ेगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
written by Siddhi Srivastava



