
Crisis: जिस पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से कर्ज, वित्तीय दबाव और अंतरराष्ट्रीय मदद पर निर्भरता के सवालों से जूझ रही है, उसी देश को अब कर्जदार विकासशील देशों के एक अंतरराष्ट्रीय मंच की अध्यक्षता मिली है। पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने 12 अक्टूबर को बैंकॉक में आयोजित बैठक के दौरान संयुक्त राष्ट्र समर्थित Borrowers’ Platform की गवर्निंग काउंसिल की अध्यक्षता संभाली।
यह घटनाक्रम पहली नजर में विरोधाभासी लग सकता है। आखिर जो देश खुद कर्ज के दबाव से निकलने की कोशिश कर रहा है, उसे दूसरे कर्जदार देशों के मंच का नेतृत्व क्यों दिया गया? इसका जवाब इस मंच के उद्देश्य में छिपा है। यह किसी आर्थिक रूप से संपन्न या कर्जमुक्त देश को चुनने की प्रतियोगिता नहीं, बल्कि विकासशील देशों को कर्ज से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा करने, अनुभव साझा करने और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अपनी आवाज मजबूत करने का प्रयास है।
क्या है Borrowers’ Platform?
Borrowers’ Platform यानी कर्ज लेने वाले देशों का मंच अप्रैल 2026 में शुरू किया गया था। इसका सचिवालय संयुक्त राष्ट्र के व्यापार एवं विकास संगठन UNCTAD के पास है। इसका मकसद विकासशील देशों को ऐसा साझा मंच देना है, जहां वे सार्वजनिक कर्ज के प्रबंधन, कर्ज चुकाने की क्षमता, वित्तीय जोखिम और विकास के लिए धन जुटाने जैसे मुद्दों पर विचार-विमर्श कर सकें।
UNCTAD के मुताबिक, इस मंच के जरिए देश अपने अनुभव साझा कर सकते हैं, कर्ज प्रबंधन की क्षमता मजबूत कर सकते हैं और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय चर्चाओं में अपनी भागीदारी बढ़ा सकते हैं।
आसान भाषा में समझें तो कर्ज देने वाले संस्थानों और देशों के साथ बातचीत के दौरान कर्ज लेने वाले देशों के सामने भी अपनी साझा समस्याएं रखने का एक व्यवस्थित मंच होगा।
हालांकि, इसे कर्जदार देशों का ऐसा समूह नहीं समझना चाहिए, जो मिलकर कर्जदाताओं को भुगतान रोकने या शर्तें मानने के लिए बाध्य कर सके। पाकिस्तान के वित्त मंत्री ने भी स्पष्ट किया कि इस मंच की प्राथमिकता सामूहिक सौदेबाजी के बजाय आपसी सहयोग, तकनीकी जानकारी और कर्ज प्रबंधन से जुड़े अनुभवों का आदान-प्रदान है।
पाकिस्तान को ही अध्यक्षता क्यों मिली?
पाकिस्तान को यह जिम्मेदारी मिलने का मतलब यह नहीं है कि उसे कर्ज प्रबंधन का आदर्श मॉडल माना गया है। इस मंच की संरचना और उद्देश्य को देखते हुए अध्यक्षता को सदस्य देशों के बीच नेतृत्व और सहयोग की जिम्मेदारी के रूप में समझना चाहिए।
पाकिस्तान उन विकासशील देशों में शामिल है, जिन्हें कर्ज चुकाने, बाहरी वित्त जुटाने और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। ऐसे अनुभव उसे कर्जदार देशों की समस्याओं पर चर्चा करने के लिए प्रासंगिक बनाते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पाकिस्तान ने इन समस्याओं का सफल समाधान कर लिया है।
UNCTAD की जानकारी के अनुसार, मंच की स्थापना की प्रक्रिया में पाकिस्तान और मिस्र की भूमिका रही। दोनों देशों ने अन्य विकासशील देशों के साथ मिलकर इसकी संस्थागत व्यवस्था तैयार करने में योगदान दिया। अक्टूबर में हुई पहली गवर्निंग काउंसिल बैठक में पाकिस्तान को 2026–27 के वार्षिक चक्र की अध्यक्षता मिली।
इसलिए पाकिस्तान के चयन को केवल उसके कर्ज के आंकड़ों से जोड़कर देखना अधूरा होगा। यह भी देखना जरूरी है कि उसने मंच की स्थापना की प्रक्रिया में क्या भूमिका निभाई और सदस्य देशों ने नेतृत्व की व्यवस्था कैसे तय की।
पाकिस्तान की अपनी कर्ज की स्थिति कितनी गंभीर है?
पाकिस्तान लंबे समय से बाहरी वित्तीय सहायता और अंतरराष्ट्रीय ऋण कार्यक्रमों पर निर्भर रहा है। वर्ष 2023 में देश गंभीर भुगतान संकट के करीब पहुंच गया था। उस समय अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने 3 अरब डॉलर का स्टैंड-बाय अरेंजमेंट मंजूर किया था, जिसका उद्देश्य पाकिस्तान को तत्काल आर्थिक संकट से उबरने में मदद देना था।
इसके बाद 2024 में IMF ने पाकिस्तान के लिए करीब 7 अरब डॉलर के विस्तारित वित्तपोषण कार्यक्रम को मंजूरी दी। ऐसे कार्यक्रमों के तहत मिलने वाली राशि निर्धारित शर्तों, आर्थिक सुधारों और समीक्षा प्रक्रिया से जुड़ी होती है। इसलिए इसे बिना शर्त मिलने वाली आर्थिक मदद नहीं कहा जा सकता।
इस तरह पाकिस्तान की आर्थिक कहानी केवल कर्ज लेने तक सीमित नहीं है। उसे राजस्व बढ़ाने, विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत करने, भुगतान संतुलन संभालने और कर्ज चुकाने की क्षमता बेहतर करने जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है।
ध्यान देने वाली बात: मूल रिपोर्ट में मार्च 2026 तक पाकिस्तान का कुल बाहरी कर्ज 137.55 अरब डॉलर बताया गया है। इस आंकड़े को प्रकाशित करने से पहले पाकिस्तान के स्टेट बैंक, वित्त मंत्रालय या IMF के नवीनतम आधिकारिक आंकड़ों से मिलान करना जरूरी है। बाहरी कर्ज, सरकारी सार्वजनिक कर्ज और कुल देनदारियां अलग-अलग अवधारणाएं हैं।
IMF से बार-बार मदद लेने का क्या मतलब है?
जब किसी देश की विदेशी मुद्रा से होने वाली आमदनी उसके आयात, कर्ज भुगतान और अन्य बाहरी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होती, तो उसे वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में देश विदेशी कर्ज, सहायता कार्यक्रमों या अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से वित्त जुटाने की कोशिश करता है।
IMF के कार्यक्रम तत्काल वित्तीय राहत दे सकते हैं, लेकिन उनके साथ आर्थिक नीतियों और सुधारों से जुड़ी शर्तें भी हो सकती हैं। यदि किसी देश को लगातार नए ऋण की जरूरत पड़ती है, तो यह उसकी वित्तीय स्थिति और कर्ज चुकाने की क्षमता को लेकर सवाल खड़े कर सकता है।
पाकिस्तान के मामले में यही चुनौती महत्वपूर्ण है। Borrowers’ Platform की अध्यक्षता मिलने से उसके पुराने कर्ज समाप्त नहीं होंगे और न ही IMF के साथ चल रहे कार्यक्रमों की शर्तें अपने आप बदलेंगी।
कर्ज देने वालों का Paris Club क्या है?
वैश्विक कर्ज व्यवस्था में लंबे समय से कर्जदाताओं के समूह और संस्थाएं सक्रिय रही हैं। इनमें Paris Club प्रमुख है, जो आधिकारिक द्विपक्षीय कर्जदाताओं का एक अनौपचारिक समूह है। यह वित्तीय संकट का सामना कर रहे देशों के कर्ज के पुनर्गठन जैसे मामलों पर चर्चा करता है।
इसके मुकाबले Borrowers’ Platform कर्ज लेने वाले विकासशील देशों को साझा मंच उपलब्ध कराने पर केंद्रित है। इसका उद्देश्य कर्जदार देशों के बीच जानकारी और अनुभव साझा करना तथा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था से जुड़ी चर्चाओं में उनकी भागीदारी बढ़ाना है।
दोनों की भूमिकाएं एक जैसी नहीं हैं। Borrowers’ Platform को Paris Club का विकल्प या उसके समान अधिकार रखने वाली संस्था मानना सही नहीं होगा। UNCTAD के अनुसार, यह मौजूदा व्यवस्थाओं का स्थान लेने के बजाय उनके साथ मिलकर काम करने के लिए बनाया गया है।
भारत को इससे क्या लेना-देना है?
भारत के लिए इस घटनाक्रम को तीन प्रमुख पहलुओं से समझा जा सकता है।
1. विकासशील देशों की साझा आवाज
भारत भी वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में विकासशील देशों की भागीदारी और उनके हितों से जुड़े मुद्दे उठाता रहा है। Borrowers’ Platform जैसे मंच पर कर्ज की स्थिरता, वित्त जुटाने की लागत और विकास के लिए संसाधनों की उपलब्धता जैसे विषयों पर चर्चा हो सकती है।
हालांकि, इस मंच पर पाकिस्तान की अध्यक्षता मिलने का मतलब यह नहीं कि भारत की आर्थिक नीति या अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर कोई सीधा बदलाव आ गया है।
2. पड़ोसी देशों की आर्थिक स्थिरता
दक्षिण एशिया में किसी देश का गंभीर आर्थिक संकट क्षेत्रीय व्यापार, निवेश, वित्तीय भरोसे और व्यापक आर्थिक माहौल को प्रभावित कर सकता है। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति में सुधार या गिरावट पर भारत की नजर रहना स्वाभाविक है, लेकिन किसी खास प्रभाव का आकलन करने के लिए ठोस आर्थिक आंकड़ों और परिस्थितियों को देखना होगा।
3. भारत के लिए सीख और नीतिगत चर्चा
कर्ज का प्रबंधन केवल ऋण लेने या चुकाने तक सीमित नहीं है। इसमें सरकारी राजस्व, खर्च की प्राथमिकताएं, विदेशी मुद्रा भंडार, ब्याज दरें और दीर्घकालिक आर्थिक विकास जैसे कई पहलू शामिल होते हैं।
भारत के लिए भी वैश्विक मंचों पर कर्ज प्रबंधन और विकास वित्त से जुड़े अनुभवों का आदान-प्रदान उपयोगी हो सकता है। लेकिन भारत को Borrowers’ Platform के निर्णयों से क्या प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा, यह उसकी भागीदारी और मंच के आगे के काम पर निर्भर करेगा।
क्या पाकिस्तान की अध्यक्षता से कर्जदार देशों को राहत मिल जाएगी?
फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। Borrowers’ Platform की स्थापना का उद्देश्य कर्जदार देशों को चर्चा और सहयोग के लिए साझा जगह देना है। यह अपने आप कर्ज माफ नहीं करता, न ही IMF के ऋण कार्यक्रमों की शर्तें बदलता है।
इस मंच की उपयोगिता इस बात से तय होगी कि सदस्य देश कर्ज प्रबंधन से जुड़ी जानकारी कितनी प्रभावी ढंग से साझा करते हैं, वित्तीय जोखिमों की पहचान कैसे करते हैं और वैश्विक संस्थाओं के साथ संवाद में कितनी सार्थक भूमिका निभा पाते हैं।
पाकिस्तान की अध्यक्षता इस नई पहल के लिए एक महत्वपूर्ण संस्थागत कदम है, लेकिन इससे पाकिस्तान की अपनी वित्तीय चुनौतियां खत्म नहीं हो जातीं। असली परीक्षा यह होगी कि मंच अपने सदस्यों के लिए व्यावहारिक समाधान और बेहतर कर्ज प्रबंधन की दिशा में कितना काम कर पाता है।



