
LR-AShM: भारत अपनी समुद्री रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के लिए स्वदेशी हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक पर काम कर रहा है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की ओर से विकसित लॉन्ग रेंज एंटी-शिप मिसाइल (LR-AShM) इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण परियोजना है। इस मिसाइल को खास तौर पर दुश्मन के युद्धपोतों सहित समुद्री लक्ष्यों को निशाना बनाने के उद्देश्य से तैयार किया जा रहा है।
आजतक की 19 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, मिसाइल को 2027 से 2029 के बीच भारतीय नौसेना में शामिल करने की योजना है। हालांकि, वास्तविक तैनाती से पहले इसके विकास, परीक्षण और सैन्य मूल्यांकन से जुड़ी प्रक्रियाएं पूरी होना जरूरी है।
करीब 1,500 किलोमीटर की बताई जा रही है मारक क्षमता
LR-AShM की प्रमुख विशेषताओं में इसकी लंबी दूरी और हाइपरसोनिक गति शामिल हैं। उपलब्ध रक्षा संबंधी रिपोर्टों के अनुसार, इसकी मारक क्षमता लगभग 1,500 किलोमीटर बताई गई है। यह मिसाइल स्थिर लक्ष्यों के साथ-साथ गतिशील लक्ष्यों को भी निशाना बनाने के लिए डिजाइन की गई है।
DRDO के अनुसार, यह एक हाइपरसोनिक ग्लाइड मिसाइल है, जिसमें स्वदेशी एवियोनिक्स और उच्च सटीकता वाले सेंसर का इस्तेमाल किया गया है। इसकी उड़ान के दौरान दिशा बदलने की क्षमता और गति इसे विकसित करने की तकनीकी चुनौतियों का अहम हिस्सा हैं।
हाइपरसोनिक रफ्तार इसे कैसे बनाती है खास?
हाइपरसोनिक गति का अर्थ ध्वनि की गति से पांच गुना या उससे अधिक रफ्तार से है। DRDO की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, LR-AShM की गति उड़ान के दौरान शुरुआती चरण में मैक 10 तक पहुंच सकती है और इसकी औसत गति मैक 5 के आसपास बताई गई है।
इस मिसाइल की उड़ान पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलों से अलग होती है। यह क्वासी-बैलिस्टिक प्रक्षेप पथ का अनुसरण करती है और ग्लाइड चरण में दिशा बदलने जैसी क्षमताओं का उपयोग कर सकती है। ऐसी विशेषताएं किसी मिसाइल को रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाली रक्षा प्रणालियों के सामने चुनौती पैदा कर सकती हैं। हालांकि, किसी भी मिसाइल की वास्तविक प्रभावशीलता लक्ष्य की स्थिति, सेंसर, मार्गदर्शन और विरोधी की रक्षा व्यवस्था समेत कई कारकों पर निर्भर करती है।
युद्धपोतों को निशाना बनाने के लिए तैयार की जा रही मिसाइल
LR-AShM का मुख्य उद्देश्य समुद्र में मौजूद स्थिर और गतिशील लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता विकसित करना है। युद्धपोतों और बड़े नौसैनिक प्लेटफॉर्म के संदर्भ में लंबी दूरी की एंटी-शिप मिसाइलें समुद्री सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं।
इस तरह की प्रणाली से नौसेना को तटीय क्षेत्रों से दूर स्थित समुद्री लक्ष्यों के विरुद्ध कार्रवाई करने की क्षमता मिल सकती है। हालांकि, चीन या पाकिस्तान के किसी युद्धपोत को निश्चित रूप से नष्ट करने का दावा करना उचित नहीं होगा। किसी भी सैन्य कार्रवाई का परिणाम परिस्थितियों और संबंधित प्रणालियों के प्रदर्शन पर निर्भर करता है।
DRDO ने किए हैं मिसाइल के परीक्षण
LR-AShM परियोजना के तहत अब तक विकास संबंधी परीक्षण किए जा चुके हैं। रक्षा मंत्रालय ने नवंबर 2024 में लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइल के सफल परीक्षण की जानकारी दी थी। इसके बाद भी इस तकनीक के विकास और मूल्यांकन से जुड़ी गतिविधियों की खबरें सामने आई हैं।
मिसाइल को जनवरी 2026 में गणतंत्र दिवस परेड के दौरान भी प्रदर्शित किया गया था। यह इसके सार्वजनिक प्रदर्शन का एक महत्वपूर्ण अवसर था। हालांकि, किसी मिसाइल का सफल परीक्षण या परेड में प्रदर्शन अपने आप में उसकी पूर्ण परिचालन तैनाती का प्रमाण नहीं होता। सेवा में शामिल करने से पहले निर्धारित परीक्षण और सैन्य मूल्यांकन पूरे करना आवश्यक होता है।
उत्पादन बढ़ाने की भी है योजना
आजतक की रिपोर्ट में बताया गया है कि मिसाइल का शुरुआती उत्पादन प्रति वर्ष 10 से 15 इकाइयों के स्तर पर हो सकता है। आगे चलकर इस संख्या को 25 से 40 इकाइयों तक बढ़ाने की संभावना का भी उल्लेख किया गया है।
ये उत्पादन संबंधी आंकड़े रिपोर्ट में दिए गए अनुमान हैं। इनकी आधिकारिक पुष्टि और वास्तविक उत्पादन कार्यक्रम की जानकारी के लिए रक्षा मंत्रालय या DRDO की संबंधित घोषणाओं को देखना जरूरी है।
उत्पादन बढ़ाने से जुड़ी योजना का उद्देश्य भविष्य में सैन्य जरूरतों के अनुरूप पर्याप्त संख्या में मिसाइलों की उपलब्धता सुनिश्चित करना हो सकता है। लेकिन उत्पादन की गति और वास्तविक तैनाती का समय बजट, तकनीकी परीक्षण, निर्माण क्षमता और सैन्य आवश्यकताओं जैसे कारकों से प्रभावित हो सकता है।
भारतीय नौसेना के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह परियोजना?
हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री व्यापार मार्गों और सामरिक हितों की सुरक्षा भारत की रक्षा नीति का अहम हिस्सा है। लंबी दूरी तक मार करने वाली स्वदेशी एंटी-शिप मिसाइल विकसित होने से नौसेना की समुद्री प्रतिरोधक क्षमता को मजबूती मिल सकती है।
LR-AShM जैसी परियोजनाएं रक्षा तकनीक में घरेलू अनुसंधान और निर्माण को बढ़ावा देने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हैं। स्वदेशी सेंसर, मार्गदर्शन प्रणाली और हाइपरसोनिक उड़ान तकनीक का विकास भविष्य की अन्य रक्षा परियोजनाओं के लिए भी उपयोगी हो सकता है।
हालांकि, मिसाइल की वास्तविक परिचालन क्षमता, उत्पादन संख्या और सेवा में शामिल होने की समयसीमा का आकलन आधिकारिक परीक्षण परिणामों और रक्षा मंत्रालय की घोषणाओं के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
आगे क्या होगा?
LR-AShM के लिए अगला महत्वपूर्ण चरण विकास और उपयोगकर्ता मूल्यांकन से जुड़ी प्रक्रियाओं को पूरा करना है। इसके बाद ही इसके परिचालन इस्तेमाल और तैनाती के बारे में अधिक स्पष्ट जानकारी सामने आ सकेगी।
फिलहाल, यह परियोजना भारत की लंबी दूरी की समुद्री मारक क्षमता और हाइपरसोनिक तकनीक विकसित करने के प्रयासों का हिस्सा है। 2027 से 2029 के बीच सेवा में शामिल करने की बताई गई समयसीमा को संभावित योजना के रूप में देखना चाहिए, न कि अंतिम और सुनिश्चित तारीख के रूप में।
written by Siddhi Srivatsava



