
Political News: भारतीय राजनीति में कभी मज़बूत और प्रभावशाली मानी जाने वाली लेफ्ट पार्टियां – CPI और CPM – आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। देश के कई राज्यों में इनका जनाधार लगातार सिमटता जा रहा है और चुनावी नतीजे लगातार निराशाजनक होते जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इसकी सबसे बड़ी वजह कांग्रेस के साथ बार-बार किया गया गठबंधन है, जो धीरे-धीरे लेफ्ट के लिए आत्मघाती साबित हुआ।
बंगाल: जहां से शुरू हुआ पतन
पश्चिम बंगाल कभी लेफ्ट राजनीति का सबसे मज़बूत गढ़ हुआ करता था। लगातार 34 साल तक लेफ्ट फ्रंट ने यहां शासन किया, जो अपने आप में एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड है। लेकिन समय के साथ हालात बदले और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के उदय ने बंगाल की राजनीति की दिशा ही बदल दी।
इसी बीच कांग्रेस और लेफ्ट के बीच बने गठबंधन ने लेफ्ट की स्थिति को और कमजोर कर दिया। हालिया विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने लेफ्ट का साथ छोड़ते हुए सभी सीटों पर ममता बनर्जी की TMC के खिलाफ अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। इसका सबसे बड़ा नुकसान लेफ्ट पार्टियों को हुआ और नतीजा यह रहा कि बंगाल विधानसभा में लेफ्ट का खाता तक नहीं खुल पाया।
गठबंधन ने कैसे कमजोर की पहचान?
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि कांग्रेस के साथ गठबंधन में लेफ्ट अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान खो बैठी। लेफ्ट की राजनीति हमेशा से विचारधारा आधारित, जमीनी संघर्ष और मज़दूर-किसान आंदोलन पर टिकी रही है, जबकि कांग्रेस की राजनीति अधिकतर चुनावी समीकरणों और सत्ता संतुलन पर आधारित रही।
🔹जब लेफ्ट कांग्रेस के साथ आई तो
🔹उसका कोर कैडर भ्रमित हुआ,
🔹समर्थकों में वैचारिक असमंजस पैदा हुआ,
🔹और पार्टी का परंपरागत वोट बैंक धीरे-धीरे खिसकने लगा।
कई इलाकों में कार्यकर्ताओं ने महसूस किया कि लेफ्ट अब अपने मूल एजेंडे से भटक रही है, जिसका सीधा असर पार्टी की जमीनी ताकत पर पड़ा।
केरल: जहां गठबंधन बना रणनीतिक उलझन
केरल में लेफ्ट और कांग्रेस के बीच हमेशा सीधा मुकाबला रहा है। यहां दोनों ध्रुवों में बंटी राजनीति ने लंबे समय तक सत्ता परिवर्तन का सिलसिला बनाए रखा। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस से बढ़ती नजदीकी ने केरल में लेफ्ट की रणनीति को भी उलझा दिया।
एक ओर राष्ट्रीय मंच पर गठबंधन, दूसरी ओर राज्य में सीधा संघर्ष — इस दोहरी राजनीति ने कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को कन्फ्यूज कर दिया। नतीजतन लेफ्ट को अपने पारंपरिक वोट बैंक को संभालने में कठिनाई होने लगी।
क्यों पड़ा कांग्रेस से गठबंधन भारी?
विशेषज्ञों के मुताबिक, कांग्रेस के साथ गठबंधन में लेफ्ट कभी बराबरी के साझेदार की भूमिका में नहीं रह पाई। बड़े राष्ट्रीय दल के सामने उसकी राजनीतिक लाइन और एजेंडा धीरे-धीरे दबता चला गया।
🔹इस गठबंधन के तीन बड़े नुकसान सामने आए:
🔹स्वतंत्र राजनीतिक पहचान कमजोर हुई
🔹कैडर बेस में गिरावट आई
🔹जनता में भरोसा कम हुआ
धीरे-धीरे लेफ्ट पार्टियां जनता की नजर में एक मज़बूत विकल्प के बजाय कमजोर सहयोगी बनकर रह गईं।
क्या वापसी संभव है?
अब लेफ्ट पार्टियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या वे कांग्रेस से दूरी बनाकर अपनी खोई पहचान वापस ला सकती हैं? पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर गहन मंथन चल रहा है। कई नेता मानते हैं कि अब समय आ गया है कि लेफ्ट अपनी स्वतंत्र राजनीतिक लाइन, जमीनी संघर्ष और वैचारिक स्पष्टता के साथ आगे बढ़े।
यदि लेफ्ट अपने मूल सिद्धांतों — किसान, मजदूर, छात्र और सामाजिक न्याय — को केंद्र में रखकर नई रणनीति बनाती है, तो उसकी राजनीतिक वापसी संभव है। लेकिन इसके लिए उसे गठबंधन की राजनीति से बाहर निकलकर आत्मनिर्भर सियासी रास्ता अपनाना होगा।
आगे की राह क्या?
कांग्रेस से गठबंधन लेफ्ट पार्टियों के लिए रणनीतिक चूक साबित हुआ, जिसने उनकी राजनीतिक जमीन, वैचारिक पहचान और जनाधार – तीनों को कमजोर कर दिया। अब लेफ्ट के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वह गठबंधन की राजनीति से बाहर निकलकर अपनी स्वतंत्र लाइन तय करे और एक बार फिर किसान, मजदूर, युवा और छात्रों की आवाज़ बनकर उभरे। अगर लेफ्ट समय रहते अपनी रणनीति नहीं बदली, तो भारतीय राजनीति में उसका हाशिए पर जाना तय माना जा रहा है।
Written By: Anushri Yadav



