
Sports News: टी20 वर्ल्ड कप 2026 में टीम इंडिया का प्रदर्शन अब तक उतार-चढ़ाव भरा रहा है। जहां एक तरफ टीम ने अहम मुकाबले जीते हैं, वहीं दूसरी ओर एक तकनीकी कमजोरी ने क्रिकेट एक्सपर्ट्स का ध्यान खींचा है—ऑफ स्पिन के खिलाफ बल्लेबाज़ी। आंकड़े बताते हैं कि इस टूर्नामेंट में भारत को ऑफ स्पिन गेंदबाज़ी के खिलाफ अपेक्षा से ज्यादा संघर्ष करना पड़ा है, खासकर तब जब प्लेइंग इलेवन में बड़ी संख्या में लेफ्ट हैंड बल्लेबाज़ शामिल हों।
भारत की मौजूदा टी20 संयोजन में टॉप और मिडिल ऑर्डर में कई लेफ्ट हैंडर बल्लेबाज़ शामिल हैं। कुल मिलाकर छह लेफ्ट हैंड बल्लेबाज़ों की मौजूदगी विपक्षी टीमों को रणनीतिक बढ़त दे रही है। ऑफ स्पिन गेंदबाज़, जो आमतौर पर लेफ्ट हैंड बल्लेबाज़ों के खिलाफ गेंद को अंदर लाते हैं, भारत के खिलाफ लगातार इस्तेमाल किए जा रहे हैं। टूर्नामेंट के शुरुआती मैचों के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय बल्लेबाज़ों ने ऑफ स्पिन के खिलाफ 100 से ज्यादा गेंदों का सामना किया, लेकिन स्ट्राइक रेट टी20 के मानकों के हिसाब से काफी धीमा रहा। रन गति लगभग छह रन प्रति ओवर के आसपास रही, जो इस फॉर्मेट में दबाव बनाने के लिए पर्याप्त नहीं मानी जाती।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या टीम इंडिया की रणनीति में इस चुनौती का पूर्वानुमान शामिल था? टी20 क्रिकेट में मिडिल ओवर्स बेहद अहम होते हैं। यदि इस दौरान रन गति थम जाती है या विकेट गिरते हैं, तो टीम का कुल स्कोर प्रभावित होता है। भारत के कुछ मुकाबलों में यही पैटर्न देखने को मिला—ऑफ स्पिन के खिलाफ बल्लेबाज़ों ने जोखिम लेने से परहेज़ किया, लेकिन डॉट बॉल्स बढ़ने से दबाव बना और फिर गलत शॉट के कारण विकेट गिरते गए।
विश्लेषकों का मानना है कि यह समस्या सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि मानसिक भी हो सकती है। कई बल्लेबाज़ स्पिन के खिलाफ रोटेशन बनाए रखने में संघर्ष करते दिखे। खासकर जब गेंदबाज़ लगातार एक ही लाइन-लेंथ पर गेंदबाज़ी करता है, तो स्ट्राइक रोटेट करना जरूरी हो जाता है। लेकिन भारत के बल्लेबाज़ कई बार एक ही गेंदबाज़ के ओवर में ज्यादा रन नहीं निकाल पाए।
हालांकि यह भी सच है कि टीम इंडिया ने कई मौकों पर मैच अपने पक्ष में मोड़े हैं। एक मुकाबले में मिडिल ऑर्डर के दमदार प्रदर्शन ने टीम को जीत दिलाई, जिससे यह साफ है कि क्षमता की कमी नहीं है। सवाल सिर्फ निरंतरता और रणनीति का है। यदि विपक्षी टीमें सेमीफाइनल या फाइनल जैसे बड़े मैचों में इसी कमजोरी को निशाना बनाती हैं, तो दबाव और बढ़ सकता है।
टीम मैनेजमेंट के लिए अब यह जरूरी हो गया है कि नेट्स में ऑफ स्पिन के खिलाफ विशेष अभ्यास कराया जाए। लेफ्ट-राइट कॉम्बिनेशन को बेहतर तरीके से इस्तेमाल करना भी एक समाधान हो सकता है। यदि बल्लेबाज़ स्ट्राइक रोटेशन बेहतर करें और सिंगल-डबल के जरिए दबाव कम करें, तो ऑफ स्पिन का असर घटाया जा सकता है।
क्रिकेट के इस सबसे छोटे फॉर्मेट में छोटी कमजोरियां भी बड़े टूर्नामेंट में निर्णायक साबित हो सकती हैं। टीम इंडिया के पास अनुभव और प्रतिभा दोनों हैं, लेकिन नॉकआउट चरण में पहुंचने से पहले इस तकनीकी खामी को दूर करना बेहद जरूरी होगा। आंकड़े चेतावनी दे रहे हैं, लेकिन अभी भी समय है कि भारत इस चुनौती को अवसर में बदले और अपनी रणनीति में सुधार कर मजबूत वापसी करे।
टी20 वर्ल्ड कप 2026 में टीम इंडिया की ऑफ स्पिन के खिलाफ कमजोरी चर्चा का विषय जरूर बनी है, लेकिन यह ऐसी समस्या नहीं जिसे सुधारा न जा सके। आने वाले मुकाबले तय करेंगे कि यह सिर्फ एक अस्थायी रुकावट थी या वाकई कोई बड़ी रणनीतिक चूक।
Written By: Anushri Yadav



