POCSO Act : क्यों जरूरी है पॉक्सो एक्ट में ‘रोमियो जूलियट’ क्लाज, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को दिया सुझाव

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पॉक्सो एक्ट में ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज जोड़ने पर विचार करने को कहा है, ताकि आपसी सहमति वाले किशोर रिश्तों को अपराध न बनाया जाए।

POCSO Act. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया कि वह पॉक्सो (POCSO) अधिनियम में ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज जोड़ने पर विचार करे, ताकि आपसी सहमति से रिश्ते में रहने वाले किशोरों को आपराधिक मुकदमों से राहत मिल सके। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में कानून के दुरुपयोग के कारण युवाओं, पीड़ितों और उनके परिवारों को गंभीर सामाजिक और कानूनी परिणाम भुगतने पड़ते हैं।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि पॉक्सो कानून के दुरुपयोग को लेकर न्यायपालिका पहले भी कई बार चिंता जता चुकी है।

‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज क्या है?

अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज उन मामलों में अपवाद के रूप में लागू होता है, जहां दोनों पक्ष किशोर हों, रिश्ता आपसी सहमति से हो, उम्र का अंतर बहुत कम हो – ऐसे मामलों को आपराधिक श्रेणी से बाहर रखने का सुझाव दिया गया है।

हाईकोर्ट के निर्देश रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस निर्देश को रद्द कर दिया, जिसमें जांच एजेंसियों को पीड़ित की उम्र तय करने के लिए शुरुआती चरण में ही ऑसिफिकेशन टेस्ट जैसे मेडिकल परीक्षण कराने को कहा गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह निर्देश किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 94 के खिलाफ है।

धारा 94 क्या कहती है?

धारा 94 के अनुसार, उम्र का निर्धारण पहले मैट्रिक या समकक्ष प्रमाण पत्र से होगा। इसके बाद नगर निगम या पंचायत द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र देखा जाएगा। इन दस्तावेजों के अभाव में ही मेडिकल टेस्ट कराया जा सकता है।

कानून के दुरुपयोग पर सख्त टिप्पणी

जस्टिस संजय करोल ने कहा कि कई मामलों में आपसी सहमति वाले रिश्तों को अपराध बना दिया जाता है, जिससे न केवल आरोपी बल्कि पीड़ित और उनके परिवारों पर भी गंभीर असर पड़ता है।

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अदालत ने यह भी सिफारिश की कि ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त तंत्र विकसित किया जाए, जो निजी दुश्मनी या सामाजिक दबाव के चलते जानबूझकर पॉक्सो एक्ट का गलत इस्तेमाल करते हैं।

केंद्र सरकार को भेजी गई कॉपी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले की एक प्रति विधि और न्याय मंत्रालय के सचिव को भेजने का निर्देश दिया है, ताकि विधायिका इस दिशा में आवश्यक कानूनी सुधारों पर विचार कर सके।

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