Maharashtra: न ब्राह्मण, न दलित…अब सिर्फ इंसान! महाराष्ट्र के इस गांव ने मिटाई जाति की दीवारें,अहमदनगर के सौदाला गांव का ऐतिहासिक फैसला

Maharashtra: महाराष्ट्र के Ahmednagar district के नेवासा तालुका में बसा सौदाला गांव इन दिनों एक खास वजह से चर्चा में है। आमतौर पर गांवों की पहचान वहां रहने वाली जातियों से जुड़ जाती है, लेकिन सौदाला ने इस सोच को बदलने का साहस दिखाया है। गांव ने सर्वसम्मति से खुद को “जातिमुक्त गांव” घोषित कर दिया है।

कैसे शुरू हुई पहल?

इस बदलाव की शुरुआत किसी राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि युवाओं की सोच से हुई। गांव के अलग-अलग जाति और धर्मों से जुड़े 15 युवाओं ने एक साथ रक्तदान किया। उनका संदेश सीधा था—जब खून का रंग एक है, तो इंसान में भेदभाव क्यों? यह प्रतीकात्मक कदम गांव के लोगों के दिल को छू गया और चर्चा का विषय बन गया।

रक्तदान के बाद विशेष ग्रामसभा बुलाई गई। सरपंच शरद आरगडे की अध्यक्षता में ग्रामीणों ने खुलकर अपने विचार रखे। लंबे समय से समाज में चली आ रही ऊंच-नीच की परंपराओं पर सवाल उठे। अंत में महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1958 के तहत मिली शक्तियों का उपयोग करते हुए सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया कि गांव में जाति आधारित भेदभाव को खत्म किया जाएगा। इस प्रस्ताव का मतलब केवल कागज पर लिखा नियम नहीं है, बल्कि सामाजिक व्यवहार में बदलाव लाने की प्रतिबद्धता है। अब गांव में सार्वजनिक कार्यक्रम, त्योहार और सामुदायिक फैसले बिना किसी जातिगत भेद के किए जाएंगे।

क्यों खास है यह फैसला?

आज भी देश के कई हिस्सों में जातिगत तनाव और भेदभाव की खबरें आती हैं। ऐसे समय में सौदाला का यह कदम उम्मीद जगाता है। ग्रामीणों का मानना है कि विकास केवल सड़कों और इमारतों से नहीं होता, बल्कि मानसिक एकता से होता है। जब गांव एकजुट होगा, तभी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में भी तेजी से प्रगति होगी।

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एक नई पहचान

सौदाला ने साफ कर दिया है कि उसकी पहचान अब ब्राह्मण, राजपूत या दलित से नहीं, बल्कि भाईचारे और समानता से होगी। यह पहल न केवल महाराष्ट्र, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा बन सकती है।

सौदाला की कहानी बताती है कि बदलाव के लिए बड़े शहरों की नहीं, बड़े दिलों की जरूरत होती है। जब समाज खुद ठान ले, तो सदियों पुरानी दीवारें भी गिर सकती हैं।

Written By: Kalpana Pandey

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