
Yuvraj Mehta case: युवराज मेहता की मौत को अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ, लेकिन लगता है कि सिस्टम ने उसे लगभग भुला दिया है। जिस घटना ने कभी प्रदेश की राजनीति और प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया था, वह आज फाइलों और बयानों के बीच दबती नजर आ रही है।
अखिलेश यादव का सरकार से सीधा सवाल
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मामले को लेकर सरकार पर तीखा हमला किया था। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था—
“जो सबसे पहले मौके पर पहुंचा था, बचाने की जिम्मेदारी उसी की थी। और वह पुलिस थी।”
अखिलेश यादव का कहना था कि यदि पुलिस समय पर और जिम्मेदारी से कार्रवाई करती, तो शायद युवराज मेहता की जान बचाई जा सकती थी।
‘सिस्टम’ का रोना और हकीकत
घटना के बाद सत्ता और प्रशासन की ओर से “सिस्टम फेल हो गया” जैसी दलीलें दी गईं। लेकिन सवाल यह है कि—
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अगर सिस्टम फेल हुआ, तो जिम्मेदार कौन है?
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गलती की सजा किसे मिली?
न कार्रवाई, न जवाबदेही
हकीकत यह है कि—
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पुलिस का कोई बड़ा अधिकारी सस्पेंड नहीं हुआ,
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जिला अधिकारी (DM) पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई,
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निलंबन तो दूर की बात है, तबादला तक नहीं किया गया।
इससे यह संदेश जा रहा है कि जवाबदेही केवल बयानों तक सीमित है, ज़मीनी स्तर पर नहीं।
सवाल अब भी ज़िंदा
युवराज मेहता का मामला आज भी कई सवाल छोड़ता है—
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क्या सिस्टम की नाकामी की कोई कीमत नहीं होती?
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क्या आम नागरिक की जान की कोई प्रशासनिक जवाबदेही नहीं है?
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क्या समय के साथ हर बड़ा मामला यूं ही भुला दिया जाएगा?
युवराज मेहता का नाम भले ही सुर्खियों से गायब हो रहा हो, लेकिन उससे जुड़े सवाल आज भी ज़िंदा हैं। जब तक जिम्मेदारों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक “न्याय” सिर्फ एक शब्द बनकर रह जाएगा।



