New Delhi News-वाइट-कॉलर आतंकवाद: राष्ट्र के भीतर पनपता अदृश्य खतरा

New Delhi News-देश के भीतर शिक्षा, प्रतिष्ठा और आतंक की खतरनाक जुगलबंदी पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा व्यक्त की गई ‘वाइट-कॉलर आतंकवाद’ को लेकर चिंता केवल एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं, बल्कि भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चेतावनी है। उदयपुर में दिया गया उनका बयान उस खतरे की ओर संकेत करता है, जो अब बंदूकधारी या जंगलों में छिपे आतंकियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि शहरों, अस्पतालों, प्रयोगशालाओं, कॉर्पोरेट दफ्तरों और शिक्षण संस्थानों के भीतर चुपचाप पनप रहा है।

दिल्ली में हालिया बम विस्फोट की घटना, जिसमें आरोपी एक शिक्षित डॉक्टर बताया गया, इस सच्चाई को और भयावह बना देती है कि आतंक का नया चेहरा पढ़ा-लिखा, पेशेवर और सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित भी हो सकता है। परंपरागत रूप से ‘वाइट-कॉलर क्राइम’ शब्द का प्रयोग आर्थिक अपराधों—जैसे घोटाले, टैक्स चोरी और कॉर्पोरेट फ्रॉड—के लिए किया जाता रहा है, लेकिन वाइट-कॉलर आतंकवाद उससे कहीं अधिक खतरनाक अवधारणा है।

यह वह स्थिति है, जब अत्यंत शिक्षित, तकनीकी रूप से दक्ष और सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित व्यक्ति आतंकवादी गतिविधियों, साजिशों या हिंसक राष्ट्रविरोधी कृत्यों में संलिप्त पाए जाते हैं। यह आतंकवाद इसलिए अधिक खतरनाक है क्योंकि यह पहचान में नहीं आता। यह सिस्टम के भीतर रहकर उसी सिस्टम पर हमला करता है और कानून व समाज—दोनों की आंखों में धूल झोंकता है।

इक्कीसवीं सदी में आतंकवाद अब केवल सीमा पार से आने वाला खतरा नहीं रह गया है। वह कट्टर विचारधाराओं, डिजिटल नेटवर्क, अकादमिक उग्रता और बौद्धिक कट्टरता के रूप में भी सामने आ रहा है। पहले आतंकवादी की पहचान हथियार, संदिग्ध गतिविधियों या प्रतिबंधित संगठनों से होती थी, आज पहचान धुंधली हो गई है। वह डॉक्टर हो सकता है, इंजीनियर, प्रोफेसर, वैज्ञानिक या आईटी विशेषज्ञ—कोई भी।

लंबे समय तक यह मान्यता रही कि शिक्षा व्यक्ति को उदार, विवेकशील और जिम्मेदार बनाती है। लेकिन हालिया घटनाएं बताती हैं कि यदि शिक्षा मूल्यहीन हो जाए, तो वह हथियार बन सकती है। उच्च शिक्षा यदि नैतिकता, राष्ट्रबोध और सामाजिक जिम्मेदारी से कटी हो, तो वही शिक्षा आतंक की प्रयोगशाला में तब्दील हो सकती है।

दिल्ली बम विस्फोट मामले में लखनऊ की एक डॉक्टर का नाम सामने आना कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है। क्या हमारी इंटेलिजेंस प्रोफाइलिंग अब भी अधूरी है? क्या हम अपराध को अब भी सामाजिक प्रतिष्ठा के चश्मे से देखते हैं? क्या पेशेवर पहचान कानून से ऊपर हो गई है? यह घटना स्पष्ट करती है कि आतंकवाद अब ‘हाशिए के लोगों’ तक सीमित नहीं, बल्कि ‘मुख्यधारा के चेहरे’ भी उसका हिस्सा बनते जा रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ अत्यधिक शिक्षित लोग कट्टर विचारधाराओं के शिकार हो जाते हैं और स्वयं को ‘विशेष सत्य’ का वाहक मानने लगते हैं। अत्यधिक शिक्षा कभी-कभी व्यक्ति को कानून से ऊपर, समाज से अलग और नैतिक नियंत्रण से मुक्त होने का भ्रम दे देती है।

आज कट्टरता किताबों से नहीं, बल्कि ऑनलाइन फोरम, डार्क वेब और एन्क्रिप्टेड चैट प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से फैल रही है। पेशेवर संस्थानों में नैतिक प्रशिक्षण की कमी और मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है।

वाइट-कॉलर आतंकवादी सिस्टम को गहराई से समझते हैं। वे उसकी कमजोरियों की पहचान कर तकनीक का दुरुपयोग करते हैं। साइबर आतंक, जैविक हथियार, रासायनिक विस्फोट और स्लीपर सेल जैसे खतरे इसी प्रवृत्ति की उपज हैं। यह आतंकवाद सीमाओं से नहीं, भीतर से हमला करता है—और यही इसे सबसे अधिक खतरनाक बनाता है।

भारत की कानून व्यवस्था अब तक पारंपरिक अपराधों से निपटने के लिए प्रशिक्षित रही है, लेकिन वाइट-कॉलर आतंकवाद के लिए एक नए दृष्टिकोण की आवश्यकता है। प्रोफाइलिंग केवल आर्थिक नहीं, वैचारिक भी होनी चाहिए। इंटेलिजेंस नेटवर्क को शिक्षण और पेशेवर संस्थानों तक पहुंचाना होगा। ‘संदिग्ध गतिविधि’ की परिभाषा बदलनी होगी।

यह केवल सरकार की लड़ाई नहीं है। समाज, परिवार, शिक्षक और मीडिया—सभी की भूमिका निर्णायक है। शिक्षकों को केवल पाठ्यक्रम नहीं, मूल्य भी सिखाने होंगे। मीडिया को सनसनी नहीं, समझ पैदा करनी होगी। समाज को यह स्वीकार करना होगा कि अत्यधिक कट्टरता, चाहे वह कितनी भी शिक्षित क्यों न हो, खतरनाक होती है।

शिक्षा व्यवस्था में सुधार आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। नैतिक शिक्षा को अनिवार्य किया जाए, संवैधानिक मूल्यों पर आधारित पाठ्यक्रम हों और आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा दिया जाए—न कि कट्टर सोच को। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक तैयार करना होना चाहिए।

वाइट-कॉलर आतंकवाद पर रक्षा मंत्री की चिंता यह संकेत देती है कि सरकार खतरे को पहचान रही है। लेकिन पहचान के साथ कठोर, निष्पक्ष और दूरदर्शी नीति भी उतनी ही जरूरी है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों से लड़ी जाती है।

वाइट-कॉलर आतंकवाद भारत के लिए एक अदृश्य, जटिल और अत्यंत खतरनाक चुनौती है। यह हमें याद दिलाता है कि डिग्री देशभक्ति की गारंटी नहीं होती। जब तक शिक्षा मूल्यवान नहीं होगी, कानून सख्त और निष्पक्ष नहीं होगा, और समाज जागरूक व सतर्क नहीं बनेगा—तब तक यह खतरा और गहराता जाएगा।

अब समय है आंखें खोलने का, भ्रम तोड़ने का और यह स्वीकार करने का कि आतंक का चेहरा बदल चुका है।

रिपोर्ट- शाश्वत तिवारी

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