
कर्नाटक में मंकी फीवर से एक व्यक्ति की मौत के बाद एक बार फिर यह गंभीर बीमारी चर्चा में आ गई है। मंकी फीवर को वैज्ञानिक भाषा में क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज (KFD) कहा जाता है। यह एक वायरल बीमारी है, जो मुख्य रूप से जंगलों और उनके आसपास के इलाकों में फैलती है।
मंकी फीवर का वायरस सबसे ज्यादा टिक्स (Ticks) नाम के छोटे कीटों के जरिए इंसानों तक पहुंचता है। ये टिक्स बंदरों, मवेशियों और अन्य जंगली जानवरों के शरीर पर पाए जाते हैं। जब कोई व्यक्ति जंगल में जाता है या संक्रमित इलाके में रहता है, तो टिक के काटने से यह वायरस शरीर में प्रवेश कर सकता है। कई मामलों में संक्रमित बंदरों की मौत के बाद भी आसपास के इलाके में खतरा बढ़ जाता है।
बीमारी के लक्षण आमतौर पर संक्रमण के 3 से 8 दिन के भीतर दिखने लगते हैं। इसमें तेज बुखार, सिरदर्द, बदन दर्द, कमजोरी, उल्टी, दस्त और कभी-कभी नाक या मसूड़ों से खून आना शामिल है। गंभीर मामलों में यह बीमारी जानलेवा भी साबित हो सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक कर्नाटक, केरल, गोवा, महाराष्ट्र और तमिलनाडु के कुछ जंगल क्षेत्रों में मंकी फीवर के मामले ज्यादा सामने आते हैं। फिलहाल इस बीमारी का कोई पुख्ता इलाज नहीं है, लेकिन समय पर इलाज और देखभाल से मरीज की जान बचाई जा सकती है।बचाव के लिए सरकार और स्वास्थ्य विभाग जंगलों में जाने वाले लोगों को वैक्सीन, पूरी बाजू के कपड़े पहनने और शरीर पर टिक-रोधी दवाओं के इस्तेमाल की सलाह देते हैं। साथ ही, किसी भी तरह के बुखार या लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना बेहद जरूरी है।
Written By: Kalpana Pandey



