Hormuz crisis India: मजबूत कूटनीति किसी भी सैन्य शक्ति से कम नहीं होती

Hormuz crisis India: पश्चिम एशिया के उथल-पुथल भरे भू-राजनीतिक परिदृश्य में जब युद्ध, प्रतिबंध और समुद्री असुरक्षा का वातावरण बन रहा है, तब भारत ने एक बार फिर अपनी परिपक्व कूटनीति और संतुलित विदेश नीति का परिचय दिया है। विश्व के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्गों में से एक Strait of Hormuz में भारत के जहाजों का सुरक्षित गुजरना केवल एक तकनीकी घटना नहीं, बल्कि एक बड़ी कूटनीतिक विजय के रूप में देखा जा रहा है।

बड़ी कूटनीतिक विजय : होर्मुज में भारत की जय

आज जब अमेरिका-ईरान-इजरायल के बीच तनाव अपने चरम पर है, तब भारत ने न तो किसी गुट का अंध समर्थन किया और न ही अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता किया। यही कारण है कि होर्मुज जैसे संवेदनशील क्षेत्र में भारत के जहाजों को सुरक्षित मार्ग मिला और ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा बनी रही।

हाल ही में खबर आई कि भारत के तेल टैंकर सुरक्षित रूप से होर्मुज से गुजरकर मुंबई पहुंचे और भारत को ऊर्जा आपूर्ति जारी रही। इसके साथ ही कूटनीतिक प्रयासों के परिणामस्वरूप भारत के कुछ जहाजों को इस संकटग्रस्त जलमार्ग से गुजरने की अनुमति भी मिली। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत की विदेश नीति अब केवल “संतुलन” तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह संकट की घड़ी में राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में सक्षम एक सक्रिय और प्रभावशाली कूटनीति में बदल चुकी है।

होर्मुज जलडमरूमध्य केवल एक समुद्री रास्ता नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की धड़कन है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का परिवहन इसी मार्ग से होता है। खाड़ी देशों से निकलने वाला तेल और एलएनजी इसी रास्ते से एशिया, यूरोप और अमेरिका तक पहुंचता है। भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा भी इसी मार्ग से आता है। भारत की लगभग 60 प्रतिशत तेल आपूर्ति खाड़ी क्षेत्र से होती है और इसका बड़ा भाग होर्मुज से होकर गुजरता है। इसलिए जब पश्चिम एशिया में युद्ध का माहौल बना और इस जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी दी गई, तो पूरी दुनिया की तरह भारत भी चिंतित हो गया।

कुछ रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि इस संकट के कारण होर्मुज के आसपास 37 भारतीय जहाज फंस गए थे और लगभग 10,000 करोड़ रुपये के कार्गो पर खतरा मंडरा रहा था। यह स्थिति केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी प्रश्न बन सकती थी।पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने वैश्विक राजनीति को अस्थिर कर दिया है। इस संघर्ष में तीन बड़े शक्ति केंद्र सक्रिय दिखाई देते हैं— अमेरिका और उसके सहयोगी, ईरान और उसके क्षेत्रीय समर्थक, तथा इजरायल। इनके बीच चल रही सैन्य और कूटनीतिक टकराहट ने पूरे खाड़ी क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है।

समुद्र में हमले, टैंकरों पर ड्रोन या मिसाइल से हमला, समुद्री मार्गों की नाकेबंदी— ये सब घटनाएं अब सामान्य होती जा रही हैं।

एक हालिया घटना में इराक के पास एक तेल टैंकर पर आत्मघाती बोट से हमला हुआ, जिसमें एक भारतीय नागरिक की मौत भी हुई। ऐसी घटनाएं इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को और बढ़ा देती हैं। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। यदि होर्मुज बंद हो जाता, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिलता, उद्योगों पर संकट बढ़ता और आर्थिक विकास दर पर बुरा असर पड़ता।

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि यदि यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहा, तो भारत की आर्थिक वृद्धि पर भी असर पड़ सकता है। भारत का अरबों डॉलर का व्यापार इस क्षेत्र से जुड़ा है। यदि जहाजों की आवाजाही रुक जाती, तो निर्यात बाधित होता और आपूर्ति श्रृंखला टूट जाती, जिससे भारतीय कंपनियों को भारी नुकसान होता। इसलिए भारत के लिए यह केवल विदेश नीति का प्रश्न नहीं, बल्कि आर्थिक अस्तित्व का सवाल था।

भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी ताकत संतुलन है। भारत के संबंध ईरान से भी अच्छे हैं, अमेरिका से भी, इजरायल से भी और खाड़ी देशों से भी। इसी संतुलन ने संकट के समय भारत को फायदा दिया। भारत ने किसी पक्ष का खुला समर्थन नहीं किया, बल्कि शांति और संवाद की अपील की और अपने जहाजों तथा नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी।

भारतीय कूटनीतिक प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि भारतीय जहाजों को होर्मुज से गुजरने की अनुमति मिल गई। यह केवल एक समुद्री अनुमति नहीं है, बल्कि भारत की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है। आज भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत रणनीतिक स्वायत्तता है। इसका अर्थ है कि भारत किसी गुट का हिस्सा नहीं है, बल्कि अपने हितों के अनुसार निर्णय लेता है।

यह नीति पहले “गुटनिरपेक्षता” के रूप में जानी जाती थी, लेकिन आज यह और अधिक व्यावहारिक रूप ले चुकी है। उदाहरण के लिए— रूस से तेल खरीदना, अमेरिका से रणनीतिक साझेदारी, और ईरान के साथ चाबहार परियोजना। ये सब भारत की बहु-आयामी विदेश नीति के उदाहरण हैं।

होर्मुज संकट ने भारत को एक और महत्वपूर्ण सबक दिया है— समुद्री शक्ति का महत्व।

भारत ने पिछले वर्षों में नौसेना के आधुनिकीकरण, हिंद महासागर में निगरानी और मित्र देशों के साथ समुद्री सहयोग जैसे क्षेत्रों में तेजी से काम किया है। भारतीय नौसेना आज अरब सागर, हिंद महासागर और मलक्का जलडमरूमध्य जैसे क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभा रही है।

भारत अब केवल तेल खरीदने वाला देश नहीं रह गया है। भारत ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यूएई और ओमान जैसे देशों से ऊर्जा आपूर्ति के नए रास्ते खोजने शुरू कर दिए हैं। इससे भारत को भविष्य में ऐसे संकटों से बचने में मदद मिलेगी। होर्मुज संकट ने दुनिया को यह संदेश दिया है कि भारत अब केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं है। भारत तेजी से वैश्विक राजनीति में संतुलन का केंद्र बन रहा है, संकट के समय भरोसेमंद साझेदार साबित हो रहा है और विश्व व्यवस्था में स्थिरता का कारक बन रहा है।

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आज दुनिया के कई देश भारत को मध्यस्थ के रूप में भी देखने लगे हैं।

हालांकि यह एक बड़ी कूटनीतिक सफलता है, लेकिन चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं। भारत को आगे ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, समुद्री सुरक्षा और पश्चिम एशिया में संतुलित संबंध जैसे क्षेत्रों में सावधानी से आगे बढ़ना होगा।

होर्मुज में भारत की सफलता किसी युद्ध की विजय नहीं है, बल्कि कूटनीति की शांत विजय है।

यह विजय बताती है कि शक्ति केवल हथियारों से नहीं आती; संवाद, विश्वास और संतुलन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। भारत ने दुनिया को यह दिखा दिया है कि वह युद्ध नहीं चाहता, लेकिन अपने हितों की रक्षा करना जानता है। आज जब दुनिया टकराव की राजनीति में उलझी हुई है, तब भारत ने शांति और संतुलन का रास्ता चुना है।

होर्मुज की यह रात केवल समुद्री मार्ग की सुरक्षा की कहानी नहीं है, यह उस भारत की कहानी है जो अपने विवेक, धैर्य और कूटनीति के बल पर वैश्विक मंच पर नई पहचान बना रहा है।

शाश्वत तिवारी (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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