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उम्र बढ़ने के साथ शारीरिक कमजोरी और मानसिक उदासी को अक्सर सामान्य मान लिया जाता है, लेकिन हालिया शोध यह संकेत देता है कि यही दोनों समस्याएं मिलकर डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारी का रास्ता खोल सकती हैं। बुज़ुर्गों पर केंद्रित एक नए अध्ययन में सामने आया है कि शारीरिक दुर्बलता और डिप्रेशन का संयुक्त प्रभाव डिमेंशिया के कुल जोखिम का एक उल्लेखनीय हिस्सा हो सकता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, जो बुज़ुर्ग लंबे समय से थकान, चलने में कठिनाई, वजन में गिरावट या मांसपेशियों की कमजोरी से जूझ रहे हैं और साथ ही अवसाद के लक्षण भी दिखा रहे हैं, उनमें याददाश्त कमजोर होने की संभावना अधिक पाई गई। अध्ययन का निष्कर्ष बताता है कि इन दोनों स्थितियों को अलग-अलग देखने की बजाय यदि इन्हें साथ में पहचाना जाए, तो डिमेंशिया के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि शारीरिक कमजोरी से व्यक्ति की सामाजिक सक्रियता घटती है, जिससे अकेलापन और मानसिक तनाव बढ़ता है। वहीं अवसाद मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को प्रभावित करता है, जो धीरे-धीरे स्मृति ह्रास का रूप ले सकता है। यही कारण है कि इन दोनों कारकों का संयुक्त प्रभाव बुज़ुर्गों के मस्तिष्क स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।
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अध्ययन यह भी दर्शाता है कि समय रहते शारीरिक गतिविधि, संतुलित आहार, मानसिक सहयोग और सामाजिक जुड़ाव बढ़ाकर इस जोखिम को कम किया जा सकता है। नियमित जांच, काउंसलिंग और हल्का व्यायाम बुज़ुर्गों को न केवल मानसिक रूप से मजबूत बना सकता है, बल्कि भविष्य में होने वाली गंभीर बीमारियों से भी बचाव कर सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, डिमेंशिया को केवल उम्र से जुड़ी समस्या मानकर नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। यदि कमजोरी और अवसाद के शुरुआती संकेतों पर ध्यान दिया जाए, तो बुज़ुर्गों को बेहतर और स्वस्थ जीवन देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा सकता है।



