
उत्तर प्रदेश। डेमोक्रेटिक मेडिकल एसोसिएशन (DMA) ने हाल ही में जारी उस नोटिस पर गंभीर चिंता व्यक्त की है, जिसमें कोविड-19 महामारी के दौरान हुई ऑनलाइन पढ़ाई के आधार पर Foreign Medical Graduate (FMG) छात्रों के खिलाफ कार्रवाई की बात सामने आई है। DMA का मानना है कि यह निर्णय हजारों भारतीय छात्रों के भविष्य को प्रभावित कर सकता है, जिन्होंने महामारी जैसी अभूतपूर्व वैश्विक परिस्थिति में अपनी चिकित्सा शिक्षा पूरी की।
DMA ने कहा कि कोविड-19 महामारी पूरी दुनिया के लिए एक वैश्विक आपातकालीन स्थिति थी, न कि FMG छात्रों द्वारा लिया गया कोई व्यक्तिगत निर्णय। उस समय दुनिया भर के विश्वविद्यालयों और मेडिकल संस्थानों ने छात्रों की सुरक्षा और शिक्षा की निरंतरता बनाए रखने के लिए ऑनलाइन कक्षाओं को एक आपातकालीन उपाय के रूप में अपनाया था। यह व्यवस्था केवल भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर लागू की गई थी।
DMA उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सूरज चौहान, प्रदेश महासचिव डॉ. भरत गुप्ता और राष्ट्रीय कोर टीम सदस्य डॉ. आर्यन श्रीवास्तव का कहना है कि वर्षों बाद उन्हीं आपातकालीन व्यवस्थाओं को आधार बनाकर छात्रों को जिम्मेदार ठहराना न केवल अनुचित है, बल्कि यह उनके करियर और मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। इन छात्रों ने अपने-अपने विश्वविद्यालयों के निर्देशों का पालन करते हुए अपनी पढ़ाई और प्रशिक्षण पूरा किया है। महामारी के दौरान यात्रा प्रतिबंध, लॉकडाउन और अन्य कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी।
डेमोक्रेटिक मेडिकल एसोसिएशन ने संबंधित प्राधिकरणों से अपील की है कि इस विषय में संवेदनशील और न्यायसंगत दृष्टिकोण अपनाया जाए। महामारी के दौरान अपनाई गई अस्थायी शैक्षणिक व्यवस्थाओं को आज नियमों के उल्लंघन के रूप में देखना उचित नहीं है। DMA का मानना है कि देश को आने वाले समय में अधिक प्रशिक्षित और समर्पित डॉक्टरों की आवश्यकता है। ऐसे में उन छात्रों का मनोबल गिराना उचित नहीं है, जिन्होंने वैश्विक संकट के बीच भी अपनी चिकित्सा शिक्षा पूरी करने का साहस और प्रतिबद्धता दिखाई।
DMA ने सरकार और संबंधित नियामक संस्थाओं से आग्रह किया है कि FMG छात्रों के हितों की रक्षा करते हुए ऐसा समाधान निकाला जाए, जिससे उनके भविष्य पर अनावश्यक अनिश्चितता न बने और वे देश की स्वास्थ्य सेवाओं में प्रभावी योगदान दे सकें।



