
State News Lucknow: उत्तर प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के दसवें दिन सदन की कार्यवाही उस समय विशेष रूप से चर्चा में रही जब सरोजनीनगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने अधिष्ठाता (पीठासीन अधिकारी) के रूप में संचालन की जिम्मेदारी संभाली। बजट सत्र आमतौर पर तीखी बहसों, राजनीतिक मतभेदों और वित्तीय प्राथमिकताओं को लेकर गंभीर विमर्श का मंच होता है। ऐसे में सदन का संचालन केवल औपचारिक दायित्व नहीं, बल्कि संसदीय गरिमा और लोकतांत्रिक संतुलन की परीक्षा भी होता है।
दसवें दिन की कार्यवाही में राज्य की वित्तीय नीतियों, ग्रामीण विकास योजनाओं, शहरी अवसंरचना, महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों तथा युवाओं के लिए रोजगार सृजन जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई। विभिन्न दलों के विधायकों ने अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याओं और अपेक्षाओं को सामने रखा। सत्ता पक्ष ने बजट की प्राथमिकताओं को विकासोन्मुख बताते हुए उसका समर्थन किया, वहीं विपक्ष ने कई योजनाओं के क्रियान्वयन, संसाधन आवंटन और जमीनी स्तर की चुनौतियों पर सवाल उठाए।
बहस के दौरान कई बार स्वर तीखे हुए और आरोप-प्रत्यारोप की स्थिति भी बनी। ऐसे क्षणों में पीठासीन अधिकारी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। डॉ. राजेश्वर सिंह ने कार्यवाही को नियमों और प्रक्रियाओं के अनुरूप संचालित करते हुए सभी पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर दिया। उन्होंने विपक्षी सदस्यों को पर्याप्त समय प्रदान किया, साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि निर्धारित समय-सीमा और प्रक्रिया का पालन हो। जब भी सदन में शोर-शराबे की स्थिति बनी, उन्होंने संयमित भाषा में हस्तक्षेप करते हुए सदस्यों को सदन की मर्यादा बनाए रखने का स्मरण कराया।

विधानसभा संचालन केवल समय-प्रबंधन तक सीमित नहीं होता। इसमें राजनीतिक तापमान को संतुलित रखना, विषय की गंभीरता बनाए रखना और बहस को रचनात्मक दिशा देना शामिल है। दसवें दिन की कार्यवाही में यह देखने को मिला कि उन्होंने किसी भी पक्ष का समर्थन या विरोध करने के बजाय नियमावली के आधार पर निर्णय दिए। कई मौकों पर उन्होंने प्रक्रिया संबंधी बिंदुओं को स्पष्ट किया और आवश्यक होने पर नियमों का हवाला भी दिया। इससे कार्यवाही व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ती रही।
राजेश्वर सिंह की पृष्ठभूमि प्रशासनिक और विधिक अनुभव से जुड़ी रही है, जिसका प्रभाव उनके संचालन में परिलक्षित हुआ। सदन में उनके निर्देश स्पष्ट और भाषा संयमित रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधायी अनुभव के साथ प्रशासनिक समझ होने से सदन संचालन में संतुलन बनाए रखने में सुविधा मिलती है।
उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य है और यहां का बजट सत्र राष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित करता है। कृषि, उद्योग, बुनियादी ढांचा, कानून-व्यवस्था, सामाजिक न्याय और कल्याणकारी योजनाओं जैसे विषयों पर होने वाली चर्चा राज्य की नीतिगत दिशा तय करती है। ऐसे में सदन की कार्यवाही का सुचारु संचालन लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
दसवें दिन विशेष रूप से ग्रामीण विकास योजनाओं की प्रगति, शहरी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं के विस्तार, महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण कार्यक्रमों की प्रभावशीलता तथा युवाओं के लिए रोजगार सृजन की रणनीतियों पर विस्तृत विचार-विमर्श हुआ। इन मुद्दों पर विभिन्न दलों के सदस्यों ने अपने-अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। बहस के दौरान असहमति के स्वर भी उभरे, लेकिन संचालन की भूमिका ने वातावरण को संतुलित बनाए रखने में सहायता की।

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सरोजनीनगर क्षेत्र, जो लखनऊ के तेजी से विकसित हो रहे इलाकों में शामिल है, शहरीकरण और ग्रामीण परिवेश का मिश्रित स्वरूप प्रस्तुत करता है। इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले विधायक के रूप में डॉ. राजेश्वर सिंह पहले भी सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सुरक्षा जैसे विषयों पर सक्रिय रहे हैं। अधिष्ठाता के रूप में उनकी भूमिका को संसदीय मर्यादा के अनुरूप बताया जा रहा है।
विधानसभा के इस सत्र ने यह संकेत दिया कि तीखी बहसों और राजनीतिक मतभेदों के बीच भी सदन को नियमों और प्रक्रिया के आधार पर संचालित किया जा सकता है। लोकतंत्र की मजबूती केवल विधायी प्रावधानों से नहीं, बल्कि उनके प्रभावी और निष्पक्ष क्रियान्वयन से भी होती है। बजट सत्र के दसवें दिन की कार्यवाही को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है, जहां संचालन की भूमिका ने बहस को व्यवस्थित और मर्यादित बनाए रखने में योगदान दिया।
@शाश्वत तिवारी
(स्वतंत्र पत्रकार)



