
National News: देश में चुनावी राजनीति के केंद्र में आ चुकी ‘फ्रीबीज’ यानी मुफ्त सुविधाओं की घोषणा पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर गंभीर सवाल उठाए हैं। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि राज्य सरकारें अगर लगातार मुफ्त योजनाएं बांटती रहेंगी, तो विकास कार्यों के लिए संसाधन कहां से जुटाए जाएंगे? अदालत की यह टिप्पणी उस समय आई है जब कई राज्य चुनावों से पहले लोकलुभावन योजनाओं की घोषणाएं कर रहे हैं।
चुनावी वादे और आर्थिक बोझ
कोर्ट ने कहा कि कई राज्य पहले से ही भारी कर्ज और राजस्व घाटे से जूझ रहे हैं, इसके बावजूद नई-नई मुफ्त योजनाएं शुरू की जा रही हैं। मुफ्त बिजली, मुफ्त राशन, मुफ्त साइकिल और यहां तक कि सीधे बैंक खातों में कैश ट्रांसफर—इन सबका वित्तीय बोझ आखिरकार राज्य के खजाने पर पड़ता है।
चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की कि अगर सरकारें हर वर्ग को मुफ्त सुविधाएं देने लगें, तो बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सृजन जैसे क्षेत्रों में निवेश के लिए धन की कमी हो सकती है। टैक्सदाताओं के पैसे का उपयोग संतुलित और जिम्मेदार तरीके से किया जाना चाहिए।
फ्रीबीज और वेलफेयर में फर्क
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वास्तविक कल्याणकारी योजनाएं और अंधाधुंध फ्रीबीज अलग-अलग चीजें हैं। गरीब और वंचित वर्ग को शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाएं देना राज्य का कर्तव्य है। लेकिन आर्थिक रूप से सक्षम लोगों को भी समान रूप से मुफ्त लाभ देना वित्तीय अनुशासन के लिहाज से उचित नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने संकेत दिया कि राज्यों को यह तय करना होगा कि कौन-सी योजना सामाजिक सुरक्षा का हिस्सा है और कौन-सी केवल चुनावी लाभ के लिए की गई घोषणा।
तमिलनाडु की बिजली सब्सिडी पर सुनवाई
यह टिप्पणी तमिलनाडु सरकार की बिजली टैरिफ सब्सिडी योजना को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आई। इस योजना के तहत कुछ समुदायों को बिजली दरों में राहत दी गई थी, जिससे पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों पर वित्तीय दबाव बढ़ने की बात कही गई।
तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि सब्सिडी के कारण राजस्व अंतर बढ़ रहा है। अदालत ने इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) रूल्स 2024 के रूल 23 का हवाला देते हुए कहा कि बिजली वितरण कंपनियों को अपनी लागत की पूरी वसूली सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि क्षेत्र की वित्तीय स्थिरता बनी रहे।
चुनाव से पहले घोषणाओं पर सवाल
कोर्ट ने यह भी पूछा कि आखिर चुनाव से ठीक पहले ही ऐसी योजनाओं की घोषणा क्यों की जाती है? अदालत का संकेत साफ था कि चुनावी टाइमिंग और मुफ्त योजनाओं के बीच संबंध पर गंभीर विमर्श की जरूरत है।
चीफ जस्टिस ने कहा कि यह मुद्दा केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर की राजनीतिक संस्कृति से जुड़ा है। अगर राज्य अपनी आय का बड़ा हिस्सा फ्रीबीज पर खर्च करेंगे, तो विकास परियोजनाओं और रोजगार सृजन के लिए संसाधन सीमित हो जाएंगे।
रोजगार बनाम मुफ्त वितरण
अदालत ने सरकारों को सलाह दी कि वे मुफ्त वितरण की बजाय रोजगार सृजन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने पर ध्यान दें। दीर्घकालिक विकास के लिए लोगों को आत्मनिर्भर बनाना ज्यादा प्रभावी है, बजाय इसके कि उन्हें लगातार मुफ्त सुविधाएं दी जाएं।
व्यापक बहस की शुरुआत
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने ‘फ्रीबीज बनाम विकास’ की बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है। एक ओर राजनीतिक दल इसे सामाजिक न्याय और राहत का माध्यम बताते हैं, वहीं दूसरी ओर आर्थिक विशेषज्ञ इसे राजकोषीय अनुशासन के लिए खतरा मानते हैं।
अदालत की टिप्पणी से साफ है कि आने वाले समय में राज्यों को लोकलुभावन वादों और वित्तीय जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाना होगा। यह मुद्दा अब केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं, बल्कि देश की आर्थिक दिशा से भी जुड़ा हुआ है।
Written By: Anushri Yadav


