Sonbhadra: साहित्य अकादमी में ‘विदा होती बेटियाँ’ के तृतीय संस्करण का भव्य लोकार्पण

संवेदना, स्मृति और सामाजिक चेतना का गहन संवाद "वैश्विक हिंदी परिवार के तत्वावधान में सम्पन्न हुआ राष्ट्रीय साहित्यिक गरिमा का विशिष्ट आयोजन"

Sonbhadra: वैश्विक हिंदी परिवार के तत्वावधान में समकालीन हिंदी कविता के चर्चित काव्य-संग्रह “विदा होती बेटियाँ” के तृतीय संस्करण का लोकार्पण, परिचर्चा एवं काव्य-पाठ समारोह साहित्य अकादमी, रवींद्र भवन, मंडी हाउस, नई दिल्ली में अत्यंत गरिमामय एवं भावपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। यह आयोजन केवल कविता, समाज एवं मानवीय संवेदना के मध्य एक सार्थक एवं गहन संवाद का सशक्त मंच सिद्ध हुआ, जहाँ साहित्यिक संवेदना, बौद्धिक विमर्श एवं आत्मीय अभिव्यक्ति का सुंदर संगम दिखाई दिया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र — अपर निजी सचिव, भारत के राष्ट्रपति; पूर्व महाप्रबंधक (राजभाषा), एनटीपीसी लिमिटेड; पूर्व कुल सचिव, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा तथा पूर्व महासचिव, विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस — ने की। मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. वंदना झा, अध्यक्ष, भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) उपस्थित रहीं। विशिष्ट सानिध्य प्रदान किया श्री अनिल जोशी जी, अध्यक्ष, वैश्विक हिंदी परिवार; पूर्व उपाध्यक्ष, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा ने। कार्यक्रम में विद्वत सहभागिता रही प्रोफेसर प्रीति सागर, डीन, भाषा विद्यापीठ, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की।

अध्यक्षीय उद्बोधन: कविता का मानवीय दायित्व
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र ने कहा कि “विदा होती बेटियाँ” केवल एक काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय की संवेदनात्मक चेतना का सशक्त अभिलेख है। उन्होंने संग्रह की मार्मिक पंक्तियाँ उद्धृत करते हुए कहा —
“कभी सोचा कहाँ था / एक दिन ऐसा होगा
जब सब कुछ होगा मेरे पास / और तुम नहीं होगी माँ।”
यह अभिव्यक्ति आधुनिक जीवन की उस गहरी विडंबना को उजागर करती है, जहाँ उपलब्धियों की चमक के मध्य रिश्तों की अनुपस्थिति सबसे बड़ी पीड़ा बन जाती है। उन्होंने आगे कहा —
“सबसे कठिन है / कठोर वक़्त में / ख़ुद को सरल बनाए रखना।”
यह पंक्ति आज के समाज के लिए एक गहन मानवीय संदेश है।

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मुख्य अतिथि उद्बोधन: स्त्री-संवेदना का संतुलित एवं गहन स्वर
मुख्य अतिथि डॉ. वंदना झा ने अपने उद्बोधन में कहा कि डॉ. ओम प्रकाश का यह काव्य-संग्रह समकालीन हिंदी कविता में स्त्री-संवेदना, पारिवारिक संरचना एवं सामाजिक चेतना का अत्यंत संतुलित एवं परिपक्व उदाहरण है। उन्होंने कहा कि यह कृति स्त्री-विमर्श को किसी घोषणात्मक आग्रह या वैचारिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के यथार्थ एवं मानवीय अनुभव की गहराई से प्रस्तुत करती है।
उन्होंने संग्रह की चर्चित पंक्तियाँ उद्धृत करते हुए कहा —
“विदा होती बेटियाँ / कभी-कभी /
हमेशा के लिए भी / विदा हो जाती हैं।”
ये पंक्तियाँ स्त्री जीवन की उस मौन पीड़ा को स्वर देती हैं, जो सामाजिक संरचनाओं के भीतर अक्सर अनकही रह जाती है।

विशिष्ट सानिध्य : कविता, करुणा और सामाजिक आत्ममंथन
श्री अनिल जोशी जी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि डॉ. ओम प्रकाश की कविताएँ समकालीन हिंदी कविता में संवेदना, करुणा एवं सामाजिक आत्ममंथन का अत्यंत सशक्त दस्तावेज़ हैं। उन्होंने कहा कि यह कृति कविता को जीवन, समाज एवं मानवीय मूल्यों से गहराई से जोड़ती है।

साहित्य अकादमी से सम्बद्ध उद्बोधन
कुमार अनुपम — सुप्रसिद्ध साहित्यकार, साहित्य अकादमी — ने कहा कि “विदा होती बेटियाँ” समकालीन हिंदी कविता में मानवीय संवेदना की अत्यंत प्रामाणिक एवं प्रभावकारी अभिव्यक्ति है।

विशेष उद्बोधन
डॉ. अलका सिन्हा, सुप्रसिद्ध लेखिका ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा:
“‘विदा होती बेटियाँ’ की कविताएँ जीवन की आंतरिक ऊष्मा, रिश्तों की गहरी स्मृतियों तथा मानवीय करुणा से निर्मित हैं। इन कविताओं में अनुभव की सच्चाई एवं भाव की प्रामाणिकता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। विशेषकर माँ और पिता पर लिखी कविताएँ पाठक के अंतर्मन को अत्यंत आत्मीय एवं मार्मिक ढंग से स्पर्श करती हैं।”

प्रोफेसर सारिका कालरा, प्राध्यापक , लेडी श्रीराम कॉलेज ने अपने उद्बोधन में कहा:
“यह काव्य-संग्रह आधुनिक समाज की संवेदनात्मक संरचना, बदलते पारिवारिक समीकरणों तथा भावनात्मक विडंबनाओं का अत्यंत प्रभावकारी काव्य-चित्र प्रस्तुत करता है। डॉ. ओम प्रकाश की कविताएँ पाठक को केवल भावुक नहीं करतीं, बल्कि उसे भीतर से विचारशील एवं आत्मसंवादी बनाती हैं। ‘विदा होती बेटियाँ’ समकालीन हिंदी कविता में संवेदना का एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर है।”

विशिष्ट वक्ताओं के विचार
कार्यक्रम में उपस्थित विशिष्ट वक्ताओं एवं विद्वानों — प्रोफेसर बीर पाल सिंह यादव, प्रोफेसर धीरेंद्र बहादुर सिंह, प्रोफेसर पदम परिहार, प्रोफेसर संजय सेठ, डॉ. अजीत मिश्र, डॉ. अविनाश पाठक, डॉ. नलिन विकास, डॉ. रुचिता सहाय सहित अन्य शिक्षाविदों एवं साहित्यकारों — ने एक स्वर में कहा कि यह काव्य-संग्रह समकालीन हिंदी कविता में संवेदना, करुणा एवं सामाजिक यथार्थ का संतुलित एवं प्रभावकारी काव्य-दस्तावेज़ है।

काव्य-पंक्तियाँ : विमर्श का केन्द्र
कार्यक्रम के दौरान संग्रह की चर्चित पंक्तियाँ —
“मैं छुपाता हूँ अपने भीतर प्यार
ताकि घनघोर अँधेरे को
तुम्हारी चौखट का सूरज बना सकूँ।”
ने सभागार में उपस्थित श्रोताओं को गहराई से प्रभावित किया।

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कवि का वक्तव्य
कवि डॉ. ओम प्रकाश ने अपने वक्तव्य में कहा:
“‘विदा होती बेटियाँ’ मेरे लिए केवल एक काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों, रिश्तों की स्मृतियों एवं मानवीय संवेदनाओं से निकला एक गहन आत्म-संवाद है। इस संग्रह की कविताएँ उन भावनात्मक क्षणों, सामाजिक यथार्थों तथा अंतर्मन की अनुभूतियों से निर्मित हैं, जिन्हें हम अपने दैनिक जीवन की व्यस्तताओं में अक्सर अनदेखा कर देते हैं।

विशेष अतिथि तनवीर हसन, वरिष्ठ पूर्व रेल अधिकारी ने कहा कि, इन कविताओं में माँ का स्नेह है, पिता का मौन संघर्ष है, बेटियों की विदाई का करुण आलोक है, और आधुनिक जीवन की संवेदनात्मक विडंबनाओं का साक्षात्कार है। यह संग्रह किसी वैचारिक आग्रह का नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर शेष बची करुणा, प्रेम एवं आत्मीयता को बचाए रखने का एक विनम्र प्रयास है।

प्रोफेसर परितोष मणि ने अपने उद्बोधन में कहा कि,
मेरी दृष्टि में कविता का मूल उद्देश्य केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि मनुष्य को उसकी संवेदनात्मक जड़ों से जोड़ना है। यदि ये कविताएँ पाठक के भीतर स्मृति, आत्मबोध एवं संवेदना का कोई स्पंदन उत्पन्न कर सकें, तो यही इस कृति की सार्थकता होगी।”

काव्य-पाठ
कार्यक्रम के दौरान सुश्री संस्कृति केशरी सहित विभिन्न सुधी वक्ताओं द्वारा काव्य-पाठ प्रस्तुत किया गया, जिसने आयोजन को अत्यंत आत्मीय एवं भावपूर्ण आयाम प्रदान किया।

संचालन एवं संयोजन
कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. अर्चना त्रिपाठी, सुप्रसिद्ध लेखिका एवं प्राध्यापक, जीसस एंड मेरी कॉलेज ने किया। आयोजन का संयोजन श्री विनयशील चतुर्वेदी द्वारा किया गया तथा धन्यवाद ज्ञापन श्री शिव कुमार निगम, संयुक्त सचिव , भारत सरकार ने प्रस्तुत किया।

कवि-परिचय
डॉ. ओम प्रकाश
समकालीन हिंदी कविता के संवेदनशील रचनाकार
वर्तमान पद:
उप महाप्रबंधक (मानव संसाधन–राजभाषा)
एनटीपीसी सिंगरौली

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