
Online Gaming Addiction : गाजियाबाद और भोपाल से सामने आई दो दर्दनाक घटनाओं ने बच्चों में बढ़ती ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया की लत को लेकर देशभर में चिंता बढ़ा दी है। गाजियाबाद में तीन सगी बहनों – निशिका, प्राची और पाखी की मौत और भोपाल में 14 वर्षीय किशोर की आत्महत्या ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म बच्चों की जिंदगी के लिए खतरा बनते जा रहे हैं।
गाजियाबाद की घटना में देर रात तीनों बहनों ने एक साथ नौवीं मंजिल से छलांग लगा दी। शुरुआती जांच में सामने आया है कि वे कथित तौर पर टास्क आधारित ऑनलाइन गेमिंग की लत में फंसी हुई थीं। मोबाइल स्क्रीन पर मिलने वाले निर्देश, भावनात्मक दबाव और “आखिरी टास्क” जैसे शब्दों ने उनके मानसिक संतुलन को बुरी तरह प्रभावित किया। वहीं भोपाल में भी एक किशोर ने ऑनलाइन गेमिंग के दबाव में जान गंवा दी। अलग-अलग शहर, लेकिन हालात और वजहें एक जैसी हैं।
असली दुनिया से दूर हो रहे बच्चे
विशेषज्ञों के मुताबिक, आज ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं रहे। कई गेम्स और डिजिटल चैलेंज बच्चों को धीरे-धीरे मानसिक जाल में फंसा लेते हैं। लगातार स्क्रीन टाइम, वर्चुअल पहचान और लक्ष्य पूरा करने का दबाव बच्चों को असली दुनिया से दूर कर रहा है। इससे तनाव, अवसाद और आत्मघाती प्रवृत्तियों का खतरा बढ़ रहा है।
गेमिंग कंपनियों पर उठ रहे सवाल
इस पूरे मुद्दे में सोशल मीडिया और गेमिंग कंपनियों की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठ रहे हैं। जानकारों का कहना है कि इन प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम बच्चों को लंबे समय तक जोड़े रखने के लिए बनाए जाते हैं। आयु सत्यापन, कंटेंट फिल्टर और स्क्रीन टाइम नियंत्रण जैसे सुरक्षा उपाय अभी भी कमजोर हैं।
ठोक कदम उठाने की जरूरत
क्या समाधान बैन है? विशेषज्ञ मानते हैं कि पूर्ण प्रतिबंध के बजाय बच्चों के लिए सख्त नियम, समय सीमा और प्रभावी निगरानी जरूरी है। माता-पिता, स्कूल और सरकार – तीनों की साझा जिम्मेदारी है कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसी घटनाएं समाज को बार-बार झकझोरती रहेंगी।



